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यज्ञ-एक समग्र जीवनदर्शन और प्रेरणा प्रवाह

Hello Readers: आज हम आपको जीवन जीने की शैली के बारे में बताने वाले है तो नीचे ध्यान से पढ़े.

यज्ञ वैदिक संस्कृति का मुख्य प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में जितना महत्त्व यज्ञ को दिया गया है, उतना शायद किसी और क्रियाकलाप को नहीं। कोई भी शुभ-अशुभ कर्म हमारे यहाँ यज्ञ के बिना अधूरा माना जाता है। जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत; जीवन के हर मोड़ पर इसका विधान जुड़ा रहता है।

यज्ञ मात्र अग्नि में आहुति देने वाला कर्मकांड भर नहीं है, वरन इसमें एक समग्र और सशक्त जीवनदर्शन छिपा हुआ है। इसकी सरल और सुबोध प्रेरणाओं में मनुष्य को उदार एवं उदात्त बनाने के वे सारे तत्त्व मौजूद हैं, जो संसार के किसी अन्य दर्शन में उपलब्ध नहीं ! इसी कारण इसे भारतीय संस्कृति का पिता कहा गया है। यज्ञीय दर्शन व्यक्ति एवं समाज को श्रेष्ठ, शालीन एवं समुन्नत बनाने में समर्थ है। यज्ञीय प्रेरणाओं को जीवन में उतारा जा सके तो यह स्थायी सुख-शांति का मजबूत आधार बन सकता है।

यजुर्वेद में इस सत्य की स्पष्ट घोषणा है कि सुख- शांति चाहने वाला कोई भी व्यक्ति यज्ञ का परित्याग नहीं करता। जो यज्ञ को छोड़ता है, उसे यज्ञ रूप परमात्मा भी 1. छोड़ देते हैं। सबकी उन्नति के लिए आहुतियाँ यज्ञ में छोड़ी जाती हैं और जो नहीं छोड़ता, उसका उत्थान संभव नहीं हो पाता है। सत्पुरुषों को सदा यज्ञपरायण होना चाहिए। यज्ञ से ही बहुत से सत्पुरुष देवता बने हैं। वास्तव में यज्ञ, जीवन के सांसारिक उत्कर्ष के साथ आत्मकल्याण को सिद्ध करने वाला साधन हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ के स्वरूप

दर्शन एवं महत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इसमें यज्ञ के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन किया गया है तथा यज्ञ को जीवन के चरम पुरुषार्थ मोक्ष का कारक माना गया है। गीता के अनुसार, यज्ञकर्म के सिवाय अन्य कर्मों में लगा हुआ मनुष्य कर्मों से बँधता है। इसलिए भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन, आसक्ति से रहित होकर उस परमेश्वर के निमित्त कर्म का भली प्रकार आचरण कर। यज्ञ, इहलोक एवं परलोक को सिद्ध करने वाला तथा मुक्ति का हेतु है।

यज्ञ का वेदोक्त आयोजन शक्तिशाली मंत्रों का विधिवत उच्चारण, विधिपूर्वक बनाए हुए कुंड, शास्त्रोक्त समिधाए तथा सामग्रियाँ जब विधानपूर्वक हवन की जाती हैं. तो उनका दिव्य प्रभाव विस्तृत आकाशमंडल में फैल जाता है। उस प्रभाव के फलस्वरूप प्रजा के अंत:करण में प्रेम एकता, सहयोग, सद्भाव, उदारता, ईमानदारी, संयम, सदाचार, आस्तिकता आदि सद्गुणों का स्वयमेव आविर्भाव होने लगता है। इस तरह व्यक्ति एवं समूह पर यज्ञ के अद्भुत सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।

वस्तुत: यज्ञ, यज् धातु से बना है, जिसके तीन अर्थ हैं- ( 1) देवपूजन, (2) संगतिकरण और (3) दान। इन तीनों प्रवृत्तियों में व्यक्ति एवं समाज के उत्कर्ष की संभावनाएँ विद्यमान हैं। देवपूजन का अर्थ है-परिष्कृत व्यक्तित्व, दैवी- सद्गुणों का अनुगमन। संगतिकरण अर्थात एकता, सहकारिता, संघबद्धता । दान अर्थात समाजपरायणता, विश्व कौटुंबिकता एवं उदार सहदयता । इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व यज्ञ करता है । सरल भाषा में यज्ञ का अर्थ दान, एकता, उपासना से है, जो मिलकर वैयक्तिक एवं सामूहिक उत्कर्ष के सशक्त साधन हैं।

यज्ञ से जुड़ा केंद्रीय तत्त्व-अग्नि, स्वयं अजत्र प्रेरणाओं से भरा हुआ है, जिसके महत्त्व को समझाते हुए ऋग्वेद में यज्ञाग्नि को पुरोहित की संज्ञा दी गई है। उसकी शिक्षाओं पर चलकर लोक-परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं, जिसमें निहित शिक्षाएँ निम्नांकित हैं।

अग्नि में जो कुछ भी बहुमूल्य पदार्थ हवन किए जाते हैं, उन्हें वह संगृहीत नहीं रखती, बल्कि सर्वसाधारण के उपयोग के लिए वायुमंडल में बिखेर देती है। इसी तरह हमारी शिक्षा, समृद्धि, प्रतिभा, प्रभाव आदि का न्यूनतम उपयोग करते हुए शेष का अधिकाधिक उपयोग जनकल्याण के लिए होना चाहिए।

छोटे या पीड़ित व्यक्ति को अपने जैसा बनाये

जो भी वस्तु अग्नि के संपर्क में आती है, उसे वह दुत्कारती नहीं, बल्कि स्वयं में आत्मसात् कर अपने जैसा बना लेती है। इसी तरह हमारे संपर्क में जो पिछड़े, छोटे या पीड़ित व्यक्ति आएँ, उन्हें आत्मसात् कर अपने जैसा बनाने का प्रयास हममें से प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए।

अग्नि की लौ पर कितना ही दबाव पड़े, लेकिन वह दबती नहीं, बल्कि ऊपर को ही उठी रहती है। इसी तरह हमारे सामने कितने ही भय, प्रलोभन एवं विषम परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, हमें अपने मनोबल, संकल्प एवं जिजीविषा को दबने नहीं देना चाहिए, बल्कि अग्निशिखा की भाँति ऊँचा उठाए रखना चाहिए।

अग्नि जीवनपर्यंत अपनी उष्णता एवं प्रकाश की विशेषताओं को नहीं छोड़ती। उसी प्रकार हमें सदैव पुरुषार्थपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीना चाहिए और अपनी सक्रियता की गरमी तथा धर्मपरायणता की रोशनी घटने नहीं देनी चाहिए।

यज्ञाग्नि में आहूत सामग्री अंततः यज्ञ भस्म के रूप में शेष बचती है। इसको मस्तक पर लगाते हुए हमें भाव करना चाहिए कि इस मानव तन का अंत मुट्ठीभर भस्म के रूप में होना तय है। ऐसे में जीवन के इस नश्वर सत्य को ध्यान में रखते हुए, अपने शेष जीवन के श्रेष्ठतम उपयोग का प्रयत्न करना चाहिए।

यज्ञाग्नि अपने में आहूत सामग्री को वायुरूप बनाकर समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने – पराये, मित्र-शत्रु का भेद किए गुप्तदान के रूप में बिखेर देती है, जो स्वयं में एक विलक्षण शिक्षण है। इसी तरह हमारा जीवन भी समस्त प्राणियों के लिए एक वरदानस्वरूप होना चाहिए। अपने संसाधन, उपलब्धियों व ज्ञान को हमें मुक्तहस्त से लोक-कल्याण में लगाने की प्रेरणा यज्ञाग्नि से लेनी चाहिए।

इस तरह यज्ञ स्वयं में प्रचंड प्रेरणाओं से भरा एक आध्यात्मिक प्रयोग है, जिसे यदि उचित विधि से संपन्न किया जाए तो इसके कर्मकांड द्वारा देव आवाहन, मंत्र प्रयोग, संकल्प एवं सद्भावनाओं की सामूहिक शक्ति से एक ऐसी सशक्त ऊर्जा पैदा की जाती है, जिसके द्वारा मनुष्य की अंत:वृत्तियों को गलाकर इच्छित स्वरूप में ढाला जा सकता

है। भाग लेने वालों में वांछित, हितकारी परिवर्तन बड़ी मात्रा में लाए जा सकते हैं । इस तरह यज्ञ व्यक्तित्व के रूपांतरण का एक गहरा मनो-आध्यात्मिक प्रयोग है, जिससे मनुष्य के प्रसुप्त देवत्व के जागरण का प्रयोजन सिद्ध होता है। इसके साथ इससे परिवार में संस्कारों का रोपण किया जा सकता है तथा समाज निर्माण एवं वातावरण के सूक्ष्मपरिष्कार का प्रयोजन सिद्ध किया जा सकता है।

इस तरह यज्ञ एक समग्र जीवनदर्शन है, जो सशक्त प्रेरणा-प्रवाह लिए हुए है। यज्ञ को जीवन का अभिन्न अंग बनाते हुए हम अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण के गहन प्रयोग को संपन्न कर सकते हैं तथा दूसरों को इसके लिए प्रेरित करते हुए परिवार, समाज, प्रकृति एवं सकल सृष्टि के हित साधन का माध्यम बन सकते हैं।

महात्मा बुद्ध की शरण में

बात उन दिनों की है, जब बुद्ध के प्रथम शिष्य आनंद श्रावस्ती पहुँचे। नगर के श्रेष्ठियों ने उनसे पूछा- “बुद्धं शरणं गच्छामि का अर्थ महात्मा बुद्ध की शरण में जाना होता है क्या? यदि ऐसा है तो यह क्या महात्मा बुद्ध के अहंकार का द्योतक नहीं? आनंद बोले- श्रेष्ठि ! क्या आपको पता है कि जब श्रमण समूह चलता है तो

यह सूत्र सभी बोलते हैं, स्वयं बुद्ध भगवान भी। व्यक्ति की शरण में जाने का भाव

इसमें होता तो वे स्वयं न दोहराते।” आनंद ने स्पष्ट किया-“तथागत का नाम तो सिद्धार्थ था। ज्ञान के प्रकाश का बोध होने पर वे बुद्ध कहलाए। जिस प्रकाश ने उन्हें बुद्ध बनाया, उसी दिव्य-दूरदर्शी विवेक की शरण में जाने का संकेत इस सूत्र में है।”

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