Meaning of Yog According to me

योग का सच्चा अर्थ अपने मूलस्वरूप में स्थित हो जाना है जो अपने व्यक्तित्व में केंद्रित हो जाता है, स्वस्थ चित्त हो जाता है, सुख- दुःख से, राग-द्वेष से, मान अपमान से परे व पार हो जाता है, उसके लिए जीवन योगमय, आनंदमय, शांतिमय हो जाता है। ज्यादातर मनुष्य, सतह पर स्वस्थ होने का दिखावा भर करते हैं, जो अपने व्यक्तित्व में समग्रता के साथ केंद्रित हो जाता है, उसके लिए जीवन उत्सव बन जाता है, व्यक्तित्व मौलिक बन जाता है।

Meaning of Yog

मनुष्य यदि अपने भीतर बँटा हुआ है तो उसके लिए, एक समग्र सोच को, एक स्वस्थ चिंतन को प्रस्तुत कर पाना संभव नहीं है। इसीलिए योग, बाहर के भटकावों को छोड़कर अंदर की स्थिरता को प्राथमिकता देता है। चित्त की शुद्धि, मन का ठहराव, व्यक्तित्व की समग्रता व जीवन का संतुलन ही योग की सच्ची परिभाषा है; उचित विवेचना है।

सत्य की झलक

इस सत्य की झलक दिखाती संत तिरुवल्लुवर की एक कथा है। एक व्यक्ति उनके पास अत्यंत व्यथित मनःस्थिति के साथ पहुँचा व बोला-“भगवन्! मुझे मन की शांति दें। भारत का ऐसा कोई मठ, आश्रम, मंदिर नहीं, जहाँ मैं न गया होऊँ, ऐसे कोई संत नहीं, जिनके चरणों में मैंने माथा न टेका हो, पर मुझे शांति न मिल सकी।” संत तिरुवल्लुवर ने उत्तर में, पास रखा एक सिक्का उठाया, उसे अपनी मुट्ठी में डाल लिया और फिर उससे पूछा-“क्या तुम इस सिक्के को बाहर बाग से ढूँढ़कर ला सकते हो।”

आश्चर्यमिश्रित स्वर में वह व्यक्ति बोला-” भगवन्! जो आपके हाथ के भीतर है, वह मुझे बाहर कैसे मिलेगा?” संत तिरुवल्लुवर बोले-“पुत्र ! तब तुम शांति भी बाहर क्यों दूँढ़ रहे हो, मन स्थिर करो, मन स्थिर हो जाएगा तो यही शांति तुम्हारे भीतर मिल जाएगी।” मन का ठहराव, व्यक्तित्व का संतुलन ही योग है,

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