तपस्या के प्रतीक ऋषि अगस्त्य

Tapasya ke pratik rishi agast

अगस्त्य (अगतियार) एक वैदिक ऋषि थे। ये वसिष्ठ मुनि के बड़े भाई थे। इनका जन्म श्रावण शुक्ल पंचमी (तदनुसार 3000 ई. पू.) को काशी में हुआ था। वर्तमान में वह स्थान अगस्त्यकुंड के नाम से प्रसिद्ध है । इनकी पत्नी लोपामुद्रा विदर्भ देश की राजकुमारी थीं। इन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। देवताओं के अनुरोध पर इन्होंने काशी छोड़कर दक्षिण की यात्रा की और बाद में वहीं बस गए थे।

जाने कौन थे ऋषि अगस्त्य

महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे महर्षि अगस्त्य को मंत्रद्रष्टा ऋषि कहा जाता है; क्योंकि उन्होंने अपने तपस्याकाल में उन मंत्रों की शक्ति को देखा था। ऋग्वेद के अनेक मंत्र इनके द्वारा दृष्ट हैं। महर्षि अगस्त्य ने ही ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165 सूक्त से 191 तक के सूक्तों को बताया था। साथ ही इनके पुत्र दृढ़ च्युत तथा दृढच्युत के पुत्र इध्मवाह भी नवम मंडल के 25वें तथा 26वें सूक्त के द्रष्टा ऋषि हैं।

महर्षि अगस्त्य को पुलस्त्य ऋषि का बेटा माना जाता है। उनके भाई का नाम विश्रवा था, जो रावण के पिता थे। पुलस्त्य ऋषि, ब्रह्मा जी के पुत्र थे महर्षि अगस्त्य ने विदर्भ नरेश की पुत्री लोपामुद्रा से विवाह किया, जो विद्वान और वेदज्ञ थीं दक्षिण भारत में उन्हें मलयध्वज नाम के पांड्य राजा की पुत्री बताया जाता है । वहाँ उनका नाम कृष्णेक्षणा है। माना जाता है कि इनका इध्मवाहन नाम का पुत्र था।

ऋषि अगस्त्य के बारे में कहा जाता है कि एक बार इन्होंने अपनी मंत्र शक्ति से समुद्र का समूचा जल पी लिया था, विंध्याचल पर्वत को झुका दिया था और मणिमती नगरी के इल्वल तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्यों की शक्ति को नष्ट कर दिया था। अगस्त्य ऋषि के काल में राजा श्रुता, बहुदस्थ और त्रसदस्यु थे। इन्होंने अगस्त्य के साथ मिलकर दैत्यराज इल्वल को झुकाकर उससे अपने राज्य के लिए धन-संपत्ति मांग ली थी।

सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः, कुंभे रेतः सिषिचतुः समानम्।

ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो ज्ञातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्॥

इस ऋचा के भाष्य में आचार्य सायण ने लिखा है-

ततो वासतीवरात् कुंभात मध्यात् ,अगस्त्यो शमीप्रमाण उदियाप प्रादुर्बभूव। तत एवं कुंभाद्वसिष्ठमप्यृषिं जातमाहुः ॥

तमिल भाषा और अगस्त्य ऋषि

दक्षिण भारत में अगस्त्य तमिल भाषा के आद्य वैय्याकरण हैं। यह कवि शुद्र जाति में उत्पन्न हुए थे, इसलिए उनका ग्रंथ ‘शुद्र वैयाकरण’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह ऋषि भी अगस्त्य के ही अवतार माने जाते हैं। ग्रंथकार के नाम परुन का यह व्याकरण ‘अगस्त्य व्याकरण’ के नाम से प्रख्यात है । तमिल विद्वानों का कहना है कि यह ग्रंथ पाणिनि अष्टाध्यायी के समान ही मान्य, प्राचीन तथा स्वतंत्र कृति है जिससे ग्रंथकार की शास्त्रीय विद्वता का पूर्ण परिचय उपलब्ध होता है।

भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके विशिष्ट योगदान के लिए जावा-सुमात्रा आदि में इनकी पूजा की जाती है। महर्षि अगस्त्य वेदों में वर्णित मंत्रद्रष्टा ऋषि हैं। इन्होंने आवश्यकता पड़ने पर कभी दैत्यों को उदरस्थ कर लिया था तो कभी समुद्र भी पी गए थे महर्षि अगस्त्य के भारतवर्ष में अनेक आश्रम हैं इनमें से कुछ मुख्य आश्रम उत्तराखंड, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु में हैं। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग नामक जिले में अगस्त्यमुनि नामक शहर भी है। यहाँ महर्षि ने तप किया था तथा आतापी-वातापी नामक दो असुरों का वध किया था।

मुनि के आश्रम के स्थान पर वर्तमान में एक मंदिर है। आस-पास के अनेक गाँवों में महर्षि अगस्त्य की इष्टदेव के रूप में मान्यता है। मंदिर में मठाधीश, पुरोहित निकटस्थ बेंजी नामक गाँव से होते हैं। दूसरा आश्रम महाराष्ट्र के नागपुर जिले में है। यहाँ महर्षि ने रामायणकाल में निवास किया था। श्रीराम के गुरु महर्षि वसिष्ठ तथा इनका आश्रम ॐ पास ही था। गुरु वसिष्ठ की आज्ञा से श्रीराम ने ऋषियों को सताने वाले असुरों का वध करने का प्रण लिया था

‘निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।’ महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को इस कार्य हेतु कभी समाप्त न होने वाले तीरों वाला तरकश प्रदान किया था।

महर्षि अगस्त्य का एक अन्य आश्रम तमिलनाडु के तिरुपति में है। पौराणिक मान्यता के अनुसार विंध्याचल पर्वत जो कि महर्षि का शिष्य था, उसका घमंड बहुत बढ़ गया था तथा उसने अपनी ऊँचाई बहुत बढ़ा दी, जिस कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बंद हो गई तथा प्राणियों में हाहाकार मच गया। सभी देवताओं ने महर्षि से अपने शिष्य को समझाने की प्रार्थना की। महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है, अत: उन्हें मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया, महर्षि ने उसे कहा कि वह उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गए। उसके पश्चात वहाँ आश्रम बनाकर उन्होंने तप किया तथा वहीं रहने लगे।

महर्षि अगस्त्य का एक आश्रम महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के अकोला जिले में प्रवरा नदी के किनारे है। यहाँ महर्षि ने रामायणकाल में निवास किया था। माना जाता है कि उनकी उपस्थिति में सभी प्राणी शत्रुता भूल गए थे। महर्षि अगस्त्य केरल में मार्शल आर्ट कलरीपायटु की दक्षिणी शैली वर्मक्कलै के संस्थापक आचार्य एवं आदिगुरु भी हैं। वर्मक्कलै नि:शस्त्र युद्ध कला शैली है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने अपने पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) को यह कला सिखाई तथा मुरुगन ने यह कला अगस्त्य को सिखाई। महक अगस्त्य ने यह कला अन्य सिद्धों को सिखाई तथा तमिल में इस पर पुस्तकें भी लिखीं। महर्षि अगस्त्य दक्षिणी चिकित्सापद्धति ‘सिद्धवैद्यम्’ के भी जनक हैं।

महर्षि अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है। इस ग्रंथ की प्राचीनता पर भी शोध हुआ है और इसे सही भी पाया गया है। आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्। छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभिः काष्ठापांसुभिः ।। दस्तालोष्टो निधात्वयः पारदाच्छादितस्ततः । संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्॥

अर्थात एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका

(Copper Sheet ) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएँ, ऊपर पारा (Mercury) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएँगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Elcctricity) का उदय होगा। अगस्त्य सेहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा ताँबे या सोने या चाँदी पर सतह चढ़ाने की विधि निकाली, अतः अगस्त्य को कुंभोद्भव भी कहते हैं।

अनने जलभंगोस्ति प्राणो दानेषु वायुषु । एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत॥

महर्षि अगस्त्य कहते हैं-सौ कुंभों (उपरोक्त प्रकार से बने तथा श्रृंखला में जोडे गए सौ सेलों) की शक्ति का पानी पर प्रयोग करेंगे तो पानी अपने रूप को बदलकर प्राण वायु तथा उदान वायु में परिवर्तित हो जाएगा।

कृत्रिमस्वर्णरजतलेपः सत्कृतिरुच्यसते । यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो ॥ आच्छादयति तत्ताम्रं स्वर्णेन रजतेन वा। सुवर्णलिप्तं तत्तामग्र शातकुंभमिति स्मृतम् ॥ अर्थात कृत्रिम स्वर्ण अथवा रजत के लेप को सत्कृति

कहा जाता है। लोहे के पात्र में सुशक्त जल ( तेजाब का घोल) इसका सान्निध्य पाते ही यवक्षार (सोने या चाँदी का नाइट्रेट) ताम्र, स्वर्ण या रजत को ढक लेता है। स्वर्ण से लिप्त उस ताम्र को शातकुंभ अथवा स्वर्ण कहा जाता है। इसका उल्लेख शुक्र नीति में भी है । आधुनिक नौकायन और विद्युतवहन, संदेशवहन आदि के लिए जो अनेक बारीक तारों की बनी मोटी केबल या डोर बनती है, वैसी प्राचीनकाल में भी बनती थी, जिसे रज्जु कहते थे।

नवभिस्तस्नुभिः सूत्रं सूत्रैस्तु नवभिर्गुणः । गुणस्तु नवभिपाशो रश्मिस्तैर्नवभिर्भवेत्। नवाष्टसप्तषड् संख्ये रश्मिभिर्रज्ज्वः स्मृताः ॥

नौ तारों का सूत्र बनता है, नौ सूत्रों का एक गुण, नौ गुणों का एक पाश, नौ पाशों से एक रश्मि और नौ, आठ, सात या छह रज्जु रश्मि मिलाकर एक रज्जु बनती है। इसके अलावा अगस्त्य मुनि ने गुब्बारों को आकाश में उड़ाने और विमान को संचालित करने की तकनीक का भी उल्लेख किया है।

जलनौकेव यानं यद्विमानं व्योम्रिकीर्तितं । कृमिकोषसमुदगतं कौषेयमिति कथ्यते ॥ सूक्ष्मासूक्ष्मौ मृदुस्थलै औतप्रोतो यथाक्रमम् । वैतानत्वं च लघुता च कौषेयस्य गुणसंग्रहः ॥ कौशेयछत्रं कर्त्तव्यं सारणा कुचनात्मकम्। छत्रं विमानद्विगुणं आयामादौ प्रतिष्ठितम्॥

अर्थात-उपरोक्त पंक्तियों में कहा गया है कि विमान वायु पर उसी तरह चलता है, जैसे जल में नाव चलती है। तत्पश्चात उन काव्य पंक्तियों में गुब्बारों और आकाश छत्र बनाने के लिए रेशमी वस्त्र को सुयोग्य कहा गया है; क्योंकि वह बड़ा लचीला होता है। प्राचीनकाल में ऐसा वस्त्र बनता था, जिसमें वायु भरी जा सकती थी। उस वस्त्र को बनाने की निम्न विधि अगस्त्य संहिता में है

क्षीकद्रुमकदबाभ्रा भयाक्षत्वश्जलैस्त्रिभिः । त्रिफलोदैस्ततस्तद्व त्पाषयुषैस्ततः स्ततः ॥

संयम्य शं्करासूक्तिचूर्ण मिश्रितवारिणां। सुरसं कुट्टनं कृत्वा वासांसि स्त्रवयेत्सुधीः ॥

अर्थात रेशमी वस्त्र पर अंजीर, कटहल, आंब, अक्ष, कदंब, मीराबोलेन वृक्ष के तीन प्रकार और दालें-इनके रस या सत्त्व के लेप किए जाते हैं। तत्पश्चात सागर तट * पर मिलने वाले शंख आदि और शर्करा का घोल यानी द्रव शीरा बनाकर वस्त्र को भिगोया जाता है, फिर उसे सुखाया जाता है। इसके उपरांत इसमें वायु भरकर उड़ा जा सकता है।

महर्षि अगस्त्य के बाद वैशेषिक दर्शन में भी ऊर्जा के स्रोत, उत्पत्ति और उपयोग के संबंध में बताया गया है। अगस्त्य ऋषि ज्ञान विज्ञान के ऋषि थे। उन्होंने सृष्टि के कल्याण के लिए घनघोर तपस्या की और संसार की समृद्धि एवं विकास के लिए अनेक आविष्कार किए।

ऋषि अगस्त्य की इस कहानी को इस उदाहरण से समझे

महाराज ययाति वैसे तो बड़े ही विद्वान और ज्ञानवान राजा थे, किंतु दुर्भाग्यवश उन्हें वासनाओं का रोग लग गया और वे उनकी तृप्ति में निमग्न हो गए । स्वाभाविक था कि ज्यों-ज्यों वे इस अग्नि में आहुति देते गए, त्यों-त्यों वह और भी प्रचंड होती गई और शीघ्र ही वह समय आ गया, जब उनका शरीर खोखला हो गया और शक्तियाँ बूढ़ी हो गईं। सारे सुकृत खोए, बेटे के प्रति अत्याचारी के रूप में कुख्यात हुए, परमार्थ का अवसर भी खोया और मृत्यु के बाद युग-युग के लिए गिरगिट की योनि पाई, किंतु वासना की पूर्ति न हो सकी।

इसी प्रकार पांडु जैसे बुद्धिमान राजा पीलिया रोग होने के साथ ही वासना के कारण ही अकालमृत्यु को प्राप्त हुए। शांतनु जैसे राजा ने बुढ़ापे में वासना के वशीभूत होकर अपने देवव्रत भीष्म जैसे महान पुत्र को गृहस्थ सुख से वंचित कर दिया। विश्वामित्र जैसे तपस्वी और इंद्र जैसे देवता वासना के कारण ही व्यभिचारी और तपभ्रष्ट होने के साथ पातकी बने ।

वासना का विष निस्संदेह बड़ा भयंकर होता है, जिससे शरीर का शोषण हो जाता है तथा लोक-परलोक तक को बिगाड़ देता है। इस विष से बचे रहने में ही मनुष्य का मंगल है।

इच्छाशक्ति को ऐसे बनाएँ प्रबल

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इच्छाशक्ति मन का वह संकल्पबल है, जो निर्धारित लक्ष्य को किसी भी कीमत पर सिद्ध करता है, उसे कल्पना लोक से उतारकर यथार्थ में मूर्तरूप प्रदान करता है। इच्छाशक्ति जितनी प्रचंड होती है, यह प्रक्रिया उतनी ही तीव्र गति से घटित होती है और समय के साथ संकल्प सृष्टि जैसे-शुन्य से निकलकर पूर्ण रूप लेते हुए सामने प्रकट हो जाती है।

इस तरह जीवन व इसका सृजन और कुछ नहीं, बल्कि संकल्पशक्ति के ही चमत्कार हैं। परम तत्त्व ब्रह्म का ‘एकोऽहम् बहुस्याम्’ का संकल्प इस सृष्टि की रचना, विस्तार एवं गति का आधार बनता है। इसी तरह सृष्टि का हर घटक उसी ईश्वरीय संकल्प के अनुरूप गतिशील है।

यह मनुष्य की ही विशेषता है कि वह सचेतन रूप में इच्छाशक्ति का प्रयोग करते हुए जीवन के बाह्य क्षेत्र में मनोवांछित उपलब्धियों को अर्जित कर सकता है तथा आंतरिक रूप में सद्गुणसंपन्न बन सकता है।

इच्छाशक्ति को ऐसे बनाएँ प्रबल

जीवन में उत्कर्ष की इच्छाशक्ति के अभाव में व्यक्ति की संभावनाएँ अपनी संपूर्ण क्षमताओं के साथ प्रकट नहीं हो पातीं। दुर्बल इच्छाशक्ति के रहते जीवन एक अंतहीन संघर्ष बन जाता है, जिसका कोई सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल पाता। दुर्बल इच्छाशक्ति के कारण जीवन पलायन का पर्याय बन जाता है, व्यक्ति राह की चुनौतियों का सामना भी नहीं कर पाता। आत्मविश्वास की कमी, भय, संशय, हीनता जैसे भावों से चित्त क्लांत रहता है तथा जीवन के प्रति एक नकारात्मक दृष्टिकोण हावी रहता है।

इस स्थिति से उबरने के लिए इच्छाशक्ति को क्रमिक रूप में विकसित किया जा सकता है तथा अवांछनीय स्थिति को बदला जा सकता है। इच्छाशक्ति शरीर की मांसपेशियों की तरह से होती है, जिसे उचित व्यायाम के साथ सशक्त बनाया जा सकता है। प्रस्तुत हैं कुछ उपाय, जिनके साथ इच्छाशक्ति को प्रबल बनाया जा सकता है

9 तरीके से ऐसे बनाएँ इच्छाशक्ति को

(1) रात्रि को समय पर शयन एवं प्रात: समय पर जागरण के साथ इच्छाशक्ति का अभ्यास किया जा सकता है। यह प्रक्रिया बिगड़ी दिनचर्या में सुधार के संकल्प का हिस्सा हो सकती है। अलार्म लगाकर प्रातः निश्चित समय पर जागरण को सुनिश्चित किया जा सकता है। फिर समय पर उठना, सरदी में रजाई से समय पर बाहर निकलना व दिनचर्या के निर्धारित कार्यक्रमों में शामिल होना-ये सब प्रबल इच्छाशक्ति के विकास के साधन माने जा सकते हैं।

(2) उठने के बाद दैनिक दिनचर्या में प्रात: भ्रमण या हलके व्यायाम, योगासन आदि को अपनाया जा सकता है। स्नान में बहुत ठंढ न हो तो शीतल जल की फुहारों के साथ इच्छाशक्ति को बढ़ाने का प्रयोग किया जा सकता है. जिसे स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी माना जाता है।

(3) खान-पान की बिगड़ी आदतों का सुधार सशक्त इच्छाशक्ति की माँग करता है। मिठाई, फास्टफूड व हानिकारक स्वादिष्ट व्यंजनों के प्रलोभन के मध्य बरता गया संयम इच्छाशक्ति का विकास करता है। इसके साथ स्वास्थ्यवर्द्धक आहार को सचेतन रूप में दिनचर्या में शामिल करना इसके अंग माने जा सकते हैं।

(4) अपने विचारों को सकारात्मक बनाए रखना इच्छाशक्ति के ही सूक्ष्म प्रयोग हैं। जीवनशैली में स्वाध्याय व सकारात्मक चिंतन का समावेश करते हुए, नकारात्मक विचारों को श्रेष्ठ विचारों से काटते हुए व्यक्ति आशावादी दृष्टिकोण का विकास करता है, जो सशक्त इच्छाशक्ति का आधार बनते हैं।

(5) अपनी किसी दुर्बलता को जीतने व इसे अपनी शक्ति में बदलने का अभ्यास इच्छाशक्ति का बहुत उपयुक्त प्रयोग रहता है। व्यक्ति की आंतरिक दुर्बलताएँ ऐसे नासूर की तरह होती हैं, जो अंदर से पीड़ा के रूप में रिसती रहती हैं, व्यक्ति को आगे नहीं बढ़ने देतीं। इनके घटने के साथ आत्मविश्वास बढ़ता है तथा इच्छाशक्ति सशक्त होती है।

(6) अर्थ का सही नियोजन इच्छाशक्ति की माँग करता है। फजूलखर्ची व अनावश्यक विलासिता से बचने तथा अपनी सीमा में सादगी भरा जीवन जीना सूझ व साहस की माँग करते हैं। इसके साथ उचित बचत एवं दान का अभ्यास इच्छाशक्ति को सुदृढ़ करते हैं।

(7) निर्धारित लक्ष्यों को समय सीमा के अंतर्गत पूरा करने का अभ्यास, मुस्तैदी एवं कठोर अनुशासन की माँग करता है, जिसके साथ इच्छाशक्ति का विकास होता है। इस रूप में कर्तव्यनिष्ठा इच्छाशक्ति को बढ़ाने की एक व्यावहारिक एवं उपयोगी विधि रहती है।

(৪) जीवन के द्वंद्वों के बीच समभाव बनाए रखना उच्चस्तरीय समझ एवं इच्छाशक्ति की माँग करता है। सुख- दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ, सफलता-असफलता के बीच समबुद्धि का अभ्यास जीवन को प्रकाशित करने वाला आध्यात्मिक प्रयोग रहता है, जिसको ध्यान के साथ संपन्न किया जा सकता है।

(9) वर्तमान संचार क्रांति के युग में जब पूरा विश्व एक स्मार्टफोन में सिमट गया हो और साथ ही जब यह व्यक्ति के लिए वरदान से अधिक अभिशाप बनता जा रहा हो, तो यह इच्छाशक्ति के अभ्यास का एक बहुत उपयुक्त

उपकरण बन जाता है। मोबाइल के तमाम प्रलोभनों के बीच इसका संयमित एवं अनुशासित उपयोग इच्छाशक्ति को विकसित करने का माध्यम बन जाता है, जिससे जुड़ी श्रेष्ठ संभावनाएँ अंततः जीवन में साकार हो उठती हैं।

इस तरह हम दैनिक जीवन में इच्छाशक्ति के छोटे छोटे अभ्यास करते हुए इसे शरीर की मांसपेशियों की भाँति ही सशक्त बना सकते हैं। हाँ! यहाँ इसके अभ्यास में अति से बचने की आवश्यकता है। शारीरिक सौष्ठव में जैसे अत्यधिक भार का प्रयोग मांसपेशियों को क्षति पहुचा सकता है, वैसे ही इच्छाशक्ति का विकास भी सम्यक अभ्यास की माँग करता है। इसके राजमार्ग पर चलते हुए, एक समय पर एक कदम बढ़ाते हुए हम सशक्त इच्छाशक्ति के स्वामी बन सकते हैं, जिसका उपयोग फिर जीवन को सचेतन रूप से मनोवांछित दिशा में विकसित करने में किया जा सकता है।

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विदेशों में गांधी जी के बारे में बहुत चर्चा होती थी। उनमें से कितने ही कुतूहलवश गांधीजी के साथ रहना चाहते थे इनमें से कुछेक को थोड़े समय ठहरने की आज्ञा मिल जाती थी, पर आश्रमवासी के रूप में उन्हें ही स्वीकृति दी जाती थी, जो आजीवन निर्धारित प्रयोजनों के लिए अपना जीवन अर्पण करना चाहते थे।

मिस स्लेड इंग्लैंड के एक सैनिक परिवार में जन्मीं उनकी बहुत इच्छा गांधी जी के संपर्क में रहने की थी। उन्हें अपने घर पर ही आश्रम जीवन का अभ्यास करने के लिए कहा गया और बन पड़े तो हिंदुस्तान आने के लिए कहा गया। मिस स्लेड हिंदुस्तान आकर मीरा बेन के नाम से प्रख्यात हुईं। उन्होंने भारत को अपना घर माना और इंग्लैंड निवासियों की नाराजगी की परवाह नहीं की। वे अपने को विश्व नागरिक बना चुकी थीं। उन्होंने पशु-पक्षियों तक से आत्मीयता स्थापित की और ऋषिकेश के समीप पशुलोक स्थापित करके जनसाधारण का ध्यान पशुओं के साथ आत्मीयता बरतने के लिए आकर्षित किया। वे आजीवन कुमारी ही रहीं।

बीती ताहि बिसारिए, आगे की सुधि लेय

Gautam Budh Updesh kahani

एक बार गौतम बुद्ध एक गाँव में उपदेश दे रहे थे। उपदेश के क्रम में बुद्ध कह रहे थे कि हर किसी को धरती माता की तरह सहनशील तथा क्षमाशील होना चाहिए क्रोध ऐसी चिनगारी है, जिससे क्रोधी व्यक्ति दूसरों के साथ-साथ स्वयं को भी जला लेता है। वह स्वयं की हानि भी कर लेता है। सभा में संपूर्ण शांति व्याप्त थी। लोग बुद्ध के वचनों को बड़े ही मनोयोग से सुन रहे थे। संयोग से उस सभा में एक ऐसा व्यक्ति बैठा था, जो अतिक्रोधी स्वभाव का था। उसे बुद्ध के द्वारा क्रोध न करने की दी गई सीख नहीं सुहा रही थी। उसे उनकी ये बातें बड़ी बेतुकी लग रही थीं।

Gautam Budh Updesh kahani

वह कुछ देर तो सुनता रहा, पर वह अचानक ही आग-बबूला हो गया और सभा के बीच खड़े होकर बुद्ध को कहने लगा-“तुम पाखंडी हो, सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करना ही तुम्हारा काम है। तुम लोगों को भ्रमित कर रहे हो। तुम्हारी ये बातें आज के समय में कोई माने नहीं रखतीं।” उसके ये सारे कटु वचन सुनकर भी बुद्ध शांत रहे। वे उसकी बातों से न तो आहत हुए और न ही कोई प्रतिक्रिया की। यह देखकर तो वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और बुद्ध को बुरा-भला कहकर वहाँ से चला गया।

अगले दिन जब उस व्यक्ति का क्रोध शांत हुआ तो उसे अपने बुरे व्यवहार पर भारी आत्मग्लानि हुई। बुद्ध जैसे महापुरुष को ऐसी-वैसी बातें कहकर अब वह पश्चात्ताप की अग्नि में जल रहा था। उसका मन बेचैन हो रहा था। वह दूसरे दिन बुद्ध को ढूँढ़ते हुए उसी स्थान पर पहुँचा, पर बद्ध अब वहाँ कैसे मिलते। वे तो अपने शिष्यों के साथ पास वाले एक अन्य गाँव को निकल चुके थे। उस व्यक्ति ने बुद्ध के बारे में लोगों से पूछा और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह वहाँ पहुँच गया, जहाँ बुद्ध प्रवचन दे रहे थे। तथागत को देखते ही वह उनके चरणो में गिर पड़ा और बोला-” मुझे क्षमा कीजिए

प्रभु!” बुद्ध ने पूछा-“तुम कौन हो भाई और तुम क्यों क्षमा माँग रहे हो?” उसने कहा-“क्या आप भूल गए मैं वही हैं, जिसने कल आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया था। मैं शर्मिंदा हूँ भगवन्! मैं मेरे दुष्ट आचरण के लिए आपसे क्षमा याचना करने आया हूँ भगवन्!” भगवान बुद्ध ने प्रेमपूर्वक कहा- “बीता हुआ कल तो मैं वहीं छोड़कर आ गया और तुम अभी भी वहीं अटके हुए हो। तुम्हें अपनी गलती का आभास हो गया, तुमने पश्चात्ताप कर लिया। अब तुम निर्मल हो चुके हो। अब तुम आज में प्रवेश करो। बुरी बातें तथा बुरी घटनाएँ याद करते रहने से वर्तमान और भविष्य दोनों बिगड़ते जाते हैं। बीते हुए कल के कारण आज को मत बिगाड़ो।”

बीती ताहि बिसारिए, आगे की सुधि लेय

जैसे मदिरा से भरे हुए घड़े को ऊपर से जल द्वारा सैकड़ों बार धोया जाए तो भी वह पवित्र नहीं होगा। उसी प्रकार दूषित अंत:करण वाला मनुष्य भी तीर्थवास या तीर्थस्नान मात्र से शुद्ध नहीं होता।

उस व्यक्ति के अंतर्मन से आत्मग्लानि का बोझ अब उतर चुका था। उसने भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर फिर कभी क्रोध नहीं करने का तथा क्षमाशील होने का संकल्प लिया बुद्ध ने उसके मस्तक पर आशीष का हाथ रखा। उस दिन से उसमें परिवर्तन आ गया और उसके जीवन में सत्य, प्रेम व करुणा की धारा बहने लगी। तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है-“बीती ताहि बिसारिए, आगे की सुधि लेय।” हम अक्सर भूतकाल की गलतियों के बारे में सोचकर दुःखी होते हैं और खुद को कोसते हैं। ऐसा करने से समय के नाश के अलावा कुछ नहीं होता। इसलिए हमें अपनी गलतियों को सुधारकर नए विचार व नई ऊर्जा, नई दृष्टि के साथ अपने वर्तमान व भविष्य को सँवारना चाहिए।

वृद्धाश्रमों का बढ़ता प्रचलन

old age homes ka badhta prachlan

क्या हमारा समाज अब वृद्धाश्रमों की भीड़ के लिए तैयार हो रहा है? क्योंकि आज हमारे समाज के ज्यादातर परिवारों में वृद्ध लोगों की ठीक से देख-भाल करने वाला में कोई नहीं है। अब हमारे समाज में संयुक्त परिवार नहीं रहे, में और एकल परिवारों में एक बेटा या एक बेटी वाले लोग समाज में ज्यादा हैं और यदि ऐसी स्थिति में परिवार का बेटा या बेटी विदेश चले गए, तो उन परिवारों में उनके माता- पिता की देख-भाल कौन करेगा?

बड़े महानगरों में छोटे-छोटे फ्लैटों में माता-पिता को रखना भी कोई समस्या नहीं है, लेकिन तीन चार मंजिला भवनों में जिनमें लिफ्ट नहीं होती, उनमें बुजुर्ग माता-पिता को कोई रोज ऊपर से नीचे कैसे लाए ? घर के जिम्मेदार सदस्य जब नौकरी के कारण घर से बाहर हों, तो कौन उन्हें समय पर खाना-पानी दे, दवा दे। यह एक नए तरह की समस्या खासतौर से छोटे परिवारों में उभरकर सामने आ रही है।

वृद्धाश्रमों का प्रचलन क्यों बढ़ रहा है ?

बुजुर्गों के सामने सुरक्षा की भी एक समस्या है। लोग बड़ी-बड़ी कोठियों में अकेले रहने से डरने लगे हैं; क्योंकि या लूट-पाट के मामलों में बुजुर्ग व्यक्ति ही सबसे ज्यादा निशाने या पर रहते हैं। कई बार तो नौकर ही इन्हें अपना निशाना बना न लेते हैं। ऐसे में हमारे समाज में वृद्धाश्रम ही उनका अंतिम सहारा बचता है।

आजकल ऐसे कई उदाहरण सामने आते हैं, जिसमें बुजुर्ग लोग वृद्धाश्रमों में जाना पसंद करते हैं। जैसे-अस्सी साल के एक वकील साहब का जब अपने ही घरवालों से विवाद हो गया, तो उनके घरवालों ने शहर के धर से उन्हें बेदखल कर दिया। अब वे वृद्धाश्रम में रहते हैं। उनका कहना है कि वे किराये के मकान में भी रह सकते थे, लेकिन वहाँ कौन उन्हें समय पर खाना देता और कौन उनको पर दवा देता, इसलिए वे वृद्धाश्रम चले गए।

हमारे समाज में ऐसे लोग जिनके परिवार में अब उनकी देख-भाल करने वाला कोई नहीं है, वो भी अब वृद्धाश्रम में रहना पसंद करते हैं। जिन एकल परिवारों के बच्चे विदेश चले जाते हैं, उनके माता-पिता को यदि विदेश जाने का वीजा नहीं मिलता, तो ऐसे माता-पिता भी वृद्धाश्रमों रहने के लिए चले जाते हैं। आजकल परिवार के सदस्यों इतनी दरियाँ हो गई हैं कि विदेश जाने पर बच्चों को अपने परिवार की सुध नहीं रहती। कई उदाहरण तो ऐसे सामने आए हैं, जिनमें विदेश में रहने वाले बच्चों के माता पिता गुजर गए और बच्चे उनके अंतिम दर्शन व अंतिम संस्कार के लिए भी समय पर नहीं पहुँचे। ऐसे में उनका अंतिम संस्कार वृद्धाश्रमवालों ने ही किया। अब सवाल यह है कि क्या वृद्धाश्रम में रहने वाले

बुजुर्ग मानसिक क्यों स्वस्थ नहीं

बुजुर्ग मानसिक रूप से स्वस्थ व सामान्य रह पाते हैं? यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो वृद्धाश्रम भी निजी नर्सिंग होम की तरह ही कार्य करते हैं। अगर किसी के पास पैसा है, तो उसको प्राप्त होने वाली सुविधाएँ अलग होंगी और जिसके पास कम पैसा है, उसे न्यूनतम सुविधाएँ मिलेंगी। हो सकता है कि ऐसे लोगों को चार-छह लोगों की ऐसी डोरमेट्री में रहना पड़े, जिसमें जगह कम हो। गरमी में एसी कूलर की सुविधा न हो, सिर्फ पंखा हो, समाचार सुनने अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिए उनके पास टीवी हो।

ऐसे बुजुर्ग लोग, जिनकी उम्र 70 या 75 वर्ष से ज्यादा है और वे खुद से नहीं चल पाते हैं, तो ऐसे लोगों को व्हील चेयर पर रोजाना आधा घंटा घुमाने वाला भी कोई चाहिए. फोन पर परिवार के सदस्यों से बात कराने वाला भी कोई चाहिए। नर्स समय पर उनकी जरूरतों का ध्यान रखे, यह भी जरूरी है। इस तरह की शारीरिक दिक्कतों के साथ साथ बुजुर्ग लोगों को मानसिक दिक्कतें भी होती हैं। उन्हें अकेलापन काटता है और ज्यादातर बुजुर्ग अवसाद यानी डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। वे किसी से बातचीत नहीं करते, उदास रहते हैं, परेशान रहते हैं। ऐसे में वृद्धाश्रमों को लेकर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

आजकल हमारे शहरों में फाइव स्टार होटलों की तरह ही वृद्धाश्रम भी बन गए हैं, लेकिन वे सामान्य लोगों की पहुँच से दूर हैं। इसके अलावा चाहे कितना भी अच्छा अस्पताल या नर्सिंग होम हो, लेकिन फिर भी वह घर का विकल्प तो कभी नहीं हो सकता। अत: बेहतर यही है कि हमारा समाज अच्छे आवासीय आश्रमों के बारे में नए सिरे से विचार करे और यह सोचे कि वहाँ रहने वाले बुजुर्ग लोगों को आश्रम के बजाय घर जैसा माहौल कैसे मिले ?

वृद्धाश्रम ऐसे होने चाहिए, जहाँ उन्हें थोड़ी आजादी हो, उनके मनोरंजन का भी वहाँ इंतजाम हो, उनके पढ़ने- लिखने, बाग-बगीचों में टहलने की भी व्यवस्था हो, उनके खान-पान के बेहतर विकल्प हों। उनके द्वारा यथासंभव कार्य करने की व्यवस्था हो, ध्यान साधना हेतु भी उनके लिए माहौल हो। यदि ऐसा कुछ वृद्धाश्रमों में संभव हो सका, तो वहाँ रहने वाले बुजुर्गों का जीवन कुछ बेहतर हो सकता है।

हमारे समाज में वृद्धाश्रमों के होने का मामला बुजुर्गों के लिए उनके जीवन की अंतिम वेला का इंतजाम नहीं है, बल्कि जिंदगी की सबसे उत्पादक उम्र पार कर चुके लोगों को एक सम्मानजनक जीवन देने की व्यवस्था का नाम है और वह भी ऐसे समाज में, जहाँ सदियों से वृद्ध जनों के सम्मान की परंपरा रही है इसलिए जहाँ तक

संभव हो, घर-परिवारों में ही वृद्ध जनों का सम्मान के साथ रखरखाव होना चाहिए, उनकी देख-भाल होनी चाहिए, क्योंकि वे ही तो वास्तव में उस घर-परिवार के आधार हैं, उनकी सेवा व उनके आशीर्वाद से ही वह घर परिवार सुखी हो सकता है, लेकिन जिन घरों के सदस्य अपने बुजुर्गों को साथ नहीं रखना चाहते, ऐसे में अंतिम विकल्प वृद्धाश्रम हो जाता है।

घर-परिवार वही सुखी है और वहीं स्वर्ग का निवास हैं, जहाँ वृद्ध जन सुखी हैं, संतुष्ट हैं और निरंतर अपना आशीष बरसाते हैं। जिन घरों में वृद्ध जनों को पीड़ित व प्रताड़ित किया जाता है, उनका अपमान किया जाता है; उन घरों में सुख व शांति का निवास नहीं होता।

घर वही होता है; जहाँ परिवार के सदस्य मिलकर आपस में रहते हैं, एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हैं; एकदूसरे की मदद करते हैं, इसलिए घर की जगह कोई भी वृद्धाश्रम नहीं ले सकता। लेकिन फिर भी जो बुजर्ग अब वृद्धाश्रमों में रहने के लिए मजबूर हैं, उनके लिए यदि वृद्धाश्रमों में घर जैसा माहौल निर्मित हो सके तो वृद्धाश्रमों में रहने वाले लोगों को भी अपने घर की कमी महसूस नहीं होगी और वे वहाँ सुख-शांति से रह सकेंगे।

old age homes ka badhta prachlan kahani se samjhe

एक बार महात्मा आनंद स्वामी से किसी व्यक्ति ने आत्मदर्शन करा देने के लिए आग्रह किया। स्वामी जी ने उसे जब साधना-उपासना की बात कही तो वह झल्ला उठा। बोला-” आज के वैज्ञानिक युग में बटन दबाते ही प्रकाश का प्रकट हो जाना संभव हो गया है। अतः इस युग में आपकी बातों की कोई कीमत नहीं हो सकती।’

स्वामी जी ने उत्तर दिया-” भाई! बटन दबाते ही प्रकाश हो जाता है यह तो सच है, परंतु यह तभी संभव होता है; जब बटन उस तार से संयुक्त हो, जो बल्ब तथा पावर हाउस से संबंध बनाता है। इसी तरह आत्मदर्शन के लिए भी अपने मनरूपी तार को आत्मारूपी पावरहाउस से जोड़ना पड़ता है और तब बटन दबाते ही आत्मज्योति प्रकट हो सकती है अन्यथा नहीं। विज्ञान की बात करते हो तो उसी पर पूरी आस्था रखो। विज्ञान बुरा नहीं आवश्यक है, परंतु विज्ञान का अधकचरा ज्ञान पुरानी आस्थाओं को नकार देता है, नई आस्थाओं का निर्माण कर नहीं पाता; इसीलिए वह अनिष्टकारक लगने लगता है।”

ईर्ष्यारूपी विष से बचना चाहें तो ऐसे बचें

Irsha se Aise bache

ईर्ष्या एक घातक विष है, मनोविकार है। यह बहुत ही जहरीली और नकारात्मक भावना है। यह अँगीठी की उस आग की तरह है, जो ईर्ष्यालु व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में सदैव जल रही होती है। अंततः यह उस व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक ऊर्जा को लीलकर उसे दुर्बल बना देती है, जिससे व्यक्ति जीवन में कदम-कदम पर अपमान व असफलता का घूँट पीते रहने को विवश हो जाता है। ईष्ष्या व्यक्ति को आलसी, अकर्मण्य व निराशावादी बनाती है जिसके फलस्वरूप शक्ति, सामर्थ्य व प्रतिभा होते हुए भी वह जीवन में भौतिक व आध्यात्मिक, दोनों ही दृष्टि से दीन-दुर्बल ही बना रहता है।

ईर्ष्यारूपी विष से बचने के उपाय

ईर्ष्या मनुष्य की एक हीन भावना है, जिसके कारण व्यक्ति यह सोचता है कि यदि हमारे पास वह वस्तु नहीं है तो किसी दूसरे के पास क्यों हो ? यदि हमें अमुक काम में सफलता नहीं मिली, तो किसी दूसरे को क्यों मिली? वह दूसरों की अच्छाई से, सफलता से प्रेरणा लेने के बजाय हमेशा दूसरों के सुख-शांति, सफलता व समृद्धि को देख-देखकर जलता-भुनता रहता है। वह हमेशा यही सोचता है कि आगे बढ़ते लोगों की राह में रोड़ा कैसे बना जाए? उनको कैसे नीचा दिखाया जाए। समाज में उनकी कैसे मजाक बने ? और कैसे उनकी खुशियाँ छीनी जाएँ ?

सच तो यह है कि दूसरों की राह में रोड़ा बनने से, दूसरों को नीचा देखने व दिखाने की फिराक में रहने से, दूसरों की खुशियाँ छीनने से कभी किसी व्यक्ति का भला नहीं होता, बल्कि इससे उसके स्वयं की राह में ही रोड़े

आने लगते हैं: वह स्वयं ही दूसरों के समक्ष मजाक का पात्र बनता है। अपने किए कराए पर अंतत: उसे स्वयं ही ग्लानि होती है, जिससे उसके स्वयं की सुख-शांति जाती रहती है। उसकी स्वयं की खुशियाँ समाप्त हो जाती हैं और उसके स्वयं के जीवन में ही मरघट-सा सन्नाटा पसर आता है। अत: जिस विद्या से हम दूसरों को जलाने निकलते हैं, उससे हम स्वयं ही जलने लगते हैं।

ईर्ष्या करते वक्त हमारे दिमाग के स्नायु सिकुड़ते हैं, जिसका प्रभाव हमारे अंतर्मन पर पड़ता है और अंततः उसका प्रभाव हमारे चिंतन, चरित्र, व्यवहार, स्वभाव और जीवनशैली पर भी पड़ता है। हम चिड़चिड़े हो जाते हैं और घर, परिवार का वातावरण भी कलहपूर्ण हो जाता है वह व्यक्ति झगड़ालू हो जाता है। उसका कहीं कोई मित्र नहीं होता और जो होते भी हैं, वे उससे किनारा करने लगते हैं। फलतः घर-परिवार समाज में उसकी कहीं कोई इज्जत नहीं रह जाती। अंततः वह स्वयं को अधूरा व अकेला पाकर निराशा और आत्मग्लानि से भर जाता है। अत: वह आत्मघात, आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाता है।

इंर्र्याल व्यक्ति मानसिक रोगी तो होता ही है, उसका शरीर भी रुग्ण हो जाता है। उसका आत्मबल, आत्मविश्वास समाप्त हो जाते हैं। वह अंदर से बड़ा जर्जर हो जाता है। उसका ओज, तेज, वर्चस् सभी समाप्त होते चले जाते हैं । उसके मुख पर सदा अपराधी की-सी कालिमा छाई रहती है। उसके जीवन का सौंदर्य, सुख, शांति आदि समाप्त हो जाते हैं। फलतः भौतिक व आध्यात्मिक, दोनों दृष्टि से उसका पतन होने लगता है। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य ने ठीक ही कहा है कि ईष्या व्यक्ति को उसी प्रकार खा जाती है, जैसे कपड़े को कीड़ा।

ईर्ष्या के घातक प्रभाव व परिणाम

ईर्ष्या के घातक प्रभाव व परिणाम की लेकर एक बहुत ही रोचक कथा है। एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से अनुरोध किया कि वे अगले दिन प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े आलू साथ लेकर आएँ और उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिकर लाएँ जिससे वे ईर्ष्या करते हैं। जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों से घणा करता हो, वह उतने आलू लेकर आए। अगले दिन सभी लोग आलू लेकर आए, किसी के पास चार आलू थे, किसी के पास छह या आठ और प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था, जिससे वे ईर्ष्या करते थे, घूणा करते थे, नफरत करते थे।

अब महात्मा जी ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें और जहाँ भी जाएँ, खाते- पीते, सोते -जागते, उठते-बैठते, हँसते-बोलते ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी आखिर ऐसा क्यों चाहते हैं। शिष्यों को महात्मा जी के आदेश का पालन तो करना ही था। सो महात्मा जी के आदेश का पालन सभी शिष्यों ने अक्षरशः किया। दो तीन दिनों तक वे उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते- पीते, चलते-फिरते अपने साथ आलुओं को ढोते रहे।

ऐसा करना उन्हें बड़ा विचित्र लग रहा था जिनके पास जितने अधिक आलू थे, वे उतने ही अधिक परेशान थे, व कष्ट में थे। वे सभी शिष्य आपस में एकदूसरे को अपनी कष्ट-कठिनाई बताने लगे। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताए और आठवें दिन वे सभी महात्मा जी की शरण में पहुँचे। महात्मा जी ने कहा-” अब अपनी-अपनी आलू की थैलियाँ निकालकर रख दें।” शिष्यों ने चैन की साँस ली। महात्मा जी ने उन शिष्यों से पूछा-” विगत सात दिनों का आप सबों का अनुभव कैसा रहा।” शिष्यों ने महात्मा जी से अपनी आपबीती सुनाई। सबने अपने कष्टों का विवरण दिया, आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया।

सबने यही कहा कि उन आलुओं को सदा ढोते रहने की परेशानी से मुक्त होकर अब वे बड़ा हलका महसूस कर रहे हैं। महात्मा जी ने कहा-“मैंने आपको यही महसूस करने के लिए ऐसा करने को कहा था। जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बदबू देने लगे, ये आलू बोझ लगने लगे, तब जरा सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफरत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर सदैव बना रहता होगा और वह बोझ आप लोग सारी जिंदगी ढोते रहते हैं।”

महात्मा जी आगे बोले-“जरा सोचिए कि आपके मन और दिमाग की इस ईष्या के बोझ से क्या हालत होती होगी। यह ईष्यां भी आपके मन पर अनावश्यक बोझ डालती है। उसके कारण आपके मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह । इसलिए आप सब अपने मन से ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं के बोझ को निकाल फेंकिए।”

सभी शिष्यों को महात्मा जी की बातें समझ में आ गई। वे सभी उनके चरणों में नतमस्तक हुए और उस दिन से ईर्ष्या मुक्त जीवन जीने की प्रेरणा व संकल्प लेकर अपने-

अपने गंतव्य को चल दिए। हम सबों के लिए भी इस ै कहानी में एक अमूल्य प्रेरणा है, संदेश है वह यह है कि ईर्ष्या के अनावश्यक बोझ को हम अपने मन मस्तिष्क पर क्यों ढोएँ? ईष्ष्या जैसी अँगीठी की आग को मन-मस्तिष्क में रखकर हम स्वयं को क्यों जलाएँ? हम क्यों अपनी ऊर्जा का क्षरण कर अपने जीवन की हानि करें? प्रश्न उठता है कि ईष्ष्या के घातक विष से हम कैसे बचे?

ईष्र्या से बचने का अमोघ उपाय यह है कि आप अपने आप पर पूरा भरोसा रखें। जैसा कि युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा है-” विश्वास करें कि आप इस संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं। इस विश्वास के बल पर आप दुनिया की हर बड़ी-से-बड़ी उपलब्धि को हासिल कर सकते हैं। दूसरा आप अपनी उन कमियों, कमजोरियों को पहचानें, जो आपकी असफलता व असंतोष का कारण बनी हैं, अथवा होंगी आप ऊँची-से-ऊँची सफलता प्राप्त कर दूसरों के लिए आदर्श उदाहरण व प्रेरणा बनिए और साथ ही दूसरों को आगे बढ़ने अथवा बढ़ाने में अपना अमूल्य योगदान दीजिए। इससे आपके स्वयं के भीतर आत्मविश्वास, आत्मबल की भावना जागेगी जिससे न सिर्फ आपकी शक्ति-सामर्थ्य पहले से भी कई गुना अधिक बढ़ी-चढ़ी होगी, बल्कि आपको अपने ही जीवन में पहले से और अधिक बड़ी सफलता प्राप्त होगी। आपका आत्मसम्मान, आत्मगौरव बढ़ेगा जिससे आपको अपार आत्मिक आनंद की प्राप्ति होगी। घर-परिवार, समाज सब जगह आपका सम्मान होगा इससे आप भौतिक व आध्यात्मिक, दोनों ही दृष्टि से लाभ-ही-लाभ में होंगे।

“इसके साथ ही आप ईश्वर की शरणागति लेकर नित्य ईश्वर की आराधना करें। करुणा, प्रेम, न्याय, सत्य, क्षमा आदि ईश्वरीय गुणों का सदैव स्मरण करते हुए उन्हें अपने अंतस् में भी उतरने दें। हृदय में जब ईश्वर के प्रति परम प्रेम की भावनाएँ उमड़ने-घुमड़ने लगती हैं तब उस हृदय से, मन से, मस्तिष्क से ईर्र्या, नफरत, घृणा आदि नकारात्मक भावनाएँ स्वयं ही तिरोहित हो जाती हैं और व्यक्ति के जीवन में आनंद-ही-आनंद का साम्राज्य छाने लगता है।

“इसके अतिरिक्त आप अपनी दिनचर्या में स्वाध्याय को महत्त्वपूर्ण स्थान दें। नियमित स्वाध्याय के अंतर्गत आप महापुरुषों के महान जीवन प्रसंग पढ़कर उनसे प्रेरणा ग्रहण करें। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने तो स्वाध्याय को आत्मा का भोजन कहा है। स्वाध्याय के द्वारा हममें पवित्र भावनाओं का संचार होने लगता है, जिससे विपरीत-से-विपरीत परिस्थितियों में भी हम सचाई के मार्ग पर, भलाई के मार्ग पर चलने का अदम्य साहस, संकल्प व धैर्य बनाए रख पाते हैं।

“एक और महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि हम हमेशा सेवा की भावना से ओत-प्रोत रहें, जिससे हम दूसरों की

सेवा कर सकें और स्वयं को निश्छल, निष्कपट, निर्दोष बनाए रख सकें। निस्संदेह प्रेम और सेवा की पवित्र भावना से भरे हुए लोगों के जीवन में ईर्ष्यां, घृणा, नफरत जैसी नकारात्मक भावनाएँ प्रवेश ही नहीं कर सकती इस प्रकार हम ईर्ष्या के घातक विष से बच भी सकते हैं और साथ ही अपने जीवन को सुख, संतोष, शांति एवं आत्मिक आनंद से भर भी सकते हैं।”

Irsha se Aise bache kahani

एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे एक प्रभावी वक्ता थे, पर उनके मन में बहुत से दोष-दुर्गुण थे। समाजसेवा एवं सुधार के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध दिखाने में वे संकोच न करते। कोई पूछता तो वे कहते कि हम जनता के विचारों को जाग्रत एवं परिमार्जित करते हैं । उन्हें ठीक दिशा दिखाना और उन पर चलने की प्रेरणा देना हमारा काम है।

एक बार वे एक गाँव में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक विख्यात संत की चर्चा सुनी तो मंत्री जी भी दर्शन हेतु पहुँच गए। जाते ही साधु ने मंत्री जी को गोबर उठाकर लाने की आज्ञा दी। मंत्री जी साधु के इस व्यवहार से बहुत खिन्न हो गए, पर वे हँसकर उठे और किसी तरह गोबर उठा लाए। साधु बोले-“इसे यहीं रख दो और वह पुस्तक उठाकर ले आओ, उसे पोंछ दो।” मंत्री बोले- “मै हाथ धो लूँ महाराज! पुस्तक में गोबर लग जाएगा, वह और भी गंदी हो जाएगी।’

साधु गंभीर स्वर में बोले-“एक किताब उठाने में तो तुम यह देखते हो कि गंदे हाथों से किताब गंदी हो जाएगी, किंतु इतने बड़े समाज के दोष दूर करने चले हो, तुम अपने मन, अंतस् की गंदगी नहीं देखते हो? इस गंदे मन के साथ तुम जहाँ भी जाते हो, उतनी ही बुराई फैलाते हो।”

मंत्री जी को साधु की महानता व अपनी क्षुद्रता का एहसास हो गया। पहले अपने दोष दूर करो, तब समाज के दोष दूर करने चलो। वस्तुत:आत्मसाधना ही समाजसेवा की कुंजी है।

अवतार-प्रक्रिया का रहस्य

Avtar Prakriya ka Rahasya

विगत अंक में आपने पढ़ा कि लंबे समय से अपने लापता पति की खोज में शांतिकुंज पहुँची दामिनी ने उनके जल्द ही मिल जाने के पूज्यवर के दिए गए आश्वासन को अगले ही दिन सत्य हुआ पाया। शांतिकुंज परिसर में हुए मिलन के इस दुर्लभ संयोग को पूज्यवर की अनुकंपा मानते हुए वे दोनों अनुगृहीत हो पूज्य गुरुदेव से भावी जीवन के लिए उनका प्रत्यक्ष मार्गदर्शन लेकर खुशी-खुशी अपने घर को लौट गए। उन्हीं दिनों प्रसिद्ध योगी श्यामाचरण लाहिड़ी की परंपरा के श्री युक्तेश्वर गिरी के शिष्य जगदीश मुनि का शांतिकुंज आगमन हुआ। अपने गुरु के ज्योतिष एवं काल मीमांसा के ज्ञान के अविज्ञात पक्ष को उन्होंने आश्रम के शिविरार्थियों के मध्य उद्घाटित किया व युग की अवधारणा की मूल रूप में व्याख्या की। आइए पढ़ते हैं, इसके आगे का विवरण…..

ऋषि प्रसाद द्वारा अवतार-प्रक्रिया का रहस्य

ऋषि प्रसाद ने गुरु का निर्देश सुनते ही हरिद्वार जाने की मनोभूमि बना ली। समर्पित शिष्य की भाँति यह पूछने की जरूरत भी नहीं समझी कि हरिद्वार में किन संत के पास जाना है या किस आश्रम में ठहरना है? गुरु ने भी नहीं बताया। इस निर्देश और स्वीकार के बाद चार-पाँच दिन तक प्रवचन, सत्संग और साधकों के आने-जाने और स्वामी जी से उनकी भेंट-मुलाकात की व्यवस्था करने आदि का क्रम चलता रहा।

नवरात्र पूरे होने के ठीक एक दिन पहले स्वामी जी ने ऋषि से कहा-“कल का प्रवचन पूरा होने के बाद प्रस्थान करना है। हम लोग वृंदावन जाएँगे और तुम राधिका रमण जी के साथ हरिद्वार चले जाना। यहाँ से सात-आठ घंटे का सफर है। (उन दिनों सड़क मार्ग से इतना ही वक्त लगता था) राधिका जी तुम्हें मोटरगाड़ी से ले जाएंगे। दो-तीन दिन वे भी हरिद्वार-ऋषिकेश ही रहेंगे। लौटते हुए तुम्हें पूछेंगे। जिनके पास मैं भेज रहा हूँ, अनुमति दें तो वापस आ जाना। अन्यथा, जब तक वे कहें।”

सुनकर ऋषि प्रसाद ने हाँ में सिर हिलाया। एक बार भी नहीं पूछा कि कहाँ जाना है ? तैयारी में क्या करना है? वह अपने वस्त्र और सामान समेटने लगा। पता था कि कल प्रवचन का अंतिम दिन है, इसलिए सामान समेटने का वक्त नहीं मिलेगा। ऋषि को इसी तैयारी में रात के ग्यारह बज गए। आमतौर पर वह दस बजे तक सो जाता था। सुबह चार बजे उठना होता और दिन में विश्राम का वक्त नहीं मिलता, यों भी कह सकते हैं कि ब्रह्मचारी होने के कारण दिन में सोना निषिद्ध था। इसलिए आज थोड़ी देर हो गई। वैसे भी शिष्य का जागना और सोना गुरु-सेवा की श्रेणी में ही आता है। इसलिए देरी और जल्दी की क्या चिंता करना? शरीर का अपना नियम है। वह उसी के अनुसार चलता है, इसलिए ऋषि को बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई।

राधिका जी ने आकर जगाया

सुबह राधिका जी ने आकर जगाया। ऋषि ने तैयारियाँ तो रात में ही कर ली थीं। आधा-पौन घंटा नित्यकर्मों में लगा और हरिद्वार के लिए रवाना हो गया। रास्ते में राधिका जी से कई विषयों पर चर्चा हुई, लेकिन एक बार भी नहीं पूछा कि किन महापुरुष या सिद्ध संत के पास चल रहे हैं। खुद ऋषि का सरोकार अपने गुरु का आदेश पूरा करने से था और उसकी समझ थी कि वह पूरा हो रहा है तो ठीक है।

गुरु के प्रति इस निष्ठा से प्रेरित होकर ऋषि ने प्रवास और निवास के बारे में कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं समझी। तीन-चार घंटे की यात्रा तो बातचीत में ही निकल गई। दिल्ली-मेरठ का शहरी परिवेश पीछे छूटने लगा था और गंगा के स्पर्श वाला क्षेत्र शुरू हो गया था आश्विन के इन दिनों में गरमी भी विदा होने लगती है, सुबह शाम का तापमान गुलाबी शीतलता का आभास कराने लगता है। ऋषि भी गंगा-क्षेत्र की शीतल हवाओं के स्पर्श के कारण तंद्रा अनुभव करने लगा था। उसकी पलकें अपने आप मुँद गई और लगा कि नींद उतर आई है, लेकिन गाड़ी की

आवाज, आस-पास के दृश्यों और पास ही बैठे राधिका जी की उपस्थिति का बोध भी बना हुआ था। ऋषि अपने आप में खोया हुआ चुपचाप अपनी सीट पर बैठा था- लगभग सोई हुई अवस्था में।

अर्द्धसुषुप्ति या तंद्रा की अवस्था में ही ऋषि ने अनुभव किया कि सड़क पर दौड़ रही गाड़ी के साथ जैसे कई घोड़े भी चल रहे हैं। चल क्या रहे हैं, दौड़ रहे हैं, तभी तो वे खिड़की के बाहर गाड़ी के साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। उन घोड़ों पर एक युवक सवार है। हाथ में तलवार लिए वह युवक राजोचित वेशभूषा में है। लगता था कोई सेनानायक या युवराज है। दृश्य को समझने के लिए ऋषि ने आँखें पूरी तरह खोली और सजग होकर देखा तो पाया कि बाहर कुछ नहीं था। पहले की तरह आते-जाते वाहन और किनारे खड़े वृक्ष, उनके पीछे लहलहाते खेत थे ऋषि ने समझा कि अभी जो दृश्य देखा था, वह सपना ही था और टकटकी लगाकर बाहर देखने लगा। इस बीच राधिका जी को भी निहारा, वे भी सीट पर पीछे की तरफ सिर टिकाकर अधलेटी मुद्रा में सोये हुए थे।

कुछ पल बाहर देखते रहने के बाद ऋषि को फिर तंद्रा ने आ घेरा। इस बार अलग ही दृश्य दिखाई दिया। लगा जैसे आस-पास कई यज्ञकुंड बने हुए हैं। उनमें अग्नि प्रदीप्त है और कुंड से उठते हुए धूम्र से लग रहा था कि अभी- अभी आहुतियों का सत्र पूरा हुआ है। लोग प्रदीप्त अग्नि को सुरक्षित रखने का उपक्रम कर रहे हैं। दौड़ती हुई गाड़ी के साथ घोड़ों की पदचाप फिर सुनाई दी, लेकिन इस बार कोई अश्वारोही नहीं दिखाई दिया। कुछ समय इस दृश्य में रमे रहने के बाद ऋषि की तंद्रा टूटी तो वह अचकचा कर खिड़की के बाहर झाँकने लगा अब तक जो दिखाई दे रहा था, उसके चिह्न कहीं भी नहीं थे, लेकिन जो प्रतीति बनी हुई थी, वह यथार्थ से भी ज्यादा अनुभव हो रही थी।

इन दृश्यों को समझने की कोशिश में ऋषि सोचने लगा था कि पिछला दृश्य और यह प्रतीति सिर्फ स्वप्न या मन की कल्पना नहीं है। निश्चित ही एक आध्यात्मिक अनुभूति है। गुरुदेव ने इन अनुभूतियों को जीने और संगृहीत करने के लिए ही शायद भेजा हो। कुछ ही पलों में ऋषि ने इस विवेचन को मन से झटक दिया और अपने गुरुदेव स्वामी अखंडानंद सरस्वती का स्मरण करने लगा इस बीच राधिका जी की नोंद भी टूट गई थी। वे संभलकर बैठ गए और ऋषि की तरफ देखने लगे। मुख-मुद्रा देखकर लगा जैसे कुछ कहना चाह रहे हों। उन्हें देखकर ऋषि ने अपना अनुभव बाँटने का मन बनाया ही था कि राधिका जी ने पूछा “कमाल है। आपको भी कुछ विचित्र अनुभव हुआ है क्या?”

ऋषि ने पूछा-” किस तरह का अनुभव?” इस राधिका जी ने कहा-“मैं देख रहा हूँ। इसी इलाके आस-पास के मैदान में युद्ध चल रहा है। स्त्रियाँ उस युद्ध भाग ले रही हैं और आक्रमणकारियों को खदेड़कर भगा रही हैं। उन सैनिक नारियों का नेतृत्व एक राजोचित वेशभूषा पहने एक राजपुरुष कर रहा है। अपने बचाव के लिए उसने कवच आदि कुछ भी धारण नहीं कर रखा है। उसकी उपस्थिति ही उन नारियों और उनका साथ दे रहे पुरुषों प्रेरित कर रही है।” इस विवरण को ऋषि ने गौर से सुना और बाद में अपने अनुभव भी बताए। राधिका जी घुड़सवार राजपुरुष की आकृति के बारे में बताया और ऋषि से पूछा तो दोनों को बड़ी हैरानी हुई। दोनों द्वारा देखे गए राजपुरुषों में अद्भुत साम्य था। दोनों यह भी कह रहे कि दृश्यावलि मानसपटल पर किसी अलौकिक घटना की तरह आ-जा रही थी।

आहुतियों की दिव्य गंध

तीसरा पहर शुरू होते तक राधिका जी और ऋषि हरिद्वार पहुँच गए। दोनों पहले भी इस नगरी में कई बार आ-जा चुके थे। लेकिन इस बार पता नहीं क्यों लग रहा था कि शहर बदला-बदला है। ज्वालापुर पार करते ही ऋषि और राधिका भी गाड़ी से बाहर झाँकने लगे। बाद में दोनों ने एकदूसरे से पूछा और इस अनुभव की पुष्टि की कि इस क्षेत्र में यज्ञ में दी जा रही औषधि आहुतियों की गंध आ रही है तीर्थनगरी है, हरिद्वार में आश्रमों की भरमार है; इसलिए आहुतियों की गंध आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। दोनों को आश्चर्य इस बात पर हुआ कि हर की पैड़ी से आगे ऋषिकेश मार्ग पर निकल जाते तक सुगंध आती रही. लेकिन आस-पास कोई बड़ा आयोजन होता नहीं दिखाई दिया। हर की पैड़ी से आगे निकलते हुए दोनों के मुख से बरबस निकला कि ऐसा पहले कभी अनुभव नहीं हुआ। अद्भुत गंध है, जो दिव्य वनस्पतियों की आहुतियों से ही आ सकती है। लेकिन आश्चर्य कि पिछले दस-बारह किलोमीटर की यात्रा में इस तरह का आयोजन कहीं दिखाई नहीं दिया। बिना आयोजन के ही विराट यज्ञ में भागीदारी।

ऋषि को पलभर के लिए अपने गुरुदेव (स्वामी अखंडानंद सरस्वती) का सामीप्य अनुभव हुआ। लगा जैसे वे कह रहे थे कि जिस आध्यात्मिक सत्य के संबंध में तुम्हारे मन में उथल-पुथल मचती रहती है, उसके समाधान का यही उपयुक्त समय है, और स्थान भी। उन सिद्ध संत से साक्षात्कार भी यहाँ हो जाएगा। इस सान्निध्य और उद्बोधन का अनुभव करते हुए राधिका जी और ऋषि शांतिकुंज में प्रवेश कर रहे थे।

आश्रम में नियमित शिविरार्थियों के अलावा नवरात्र- साधना कर रहे साधक थे। उपलब्ध आवास-व्यवस्था उन शिविरार्थियों और साधकों के लिए कई बार अपर्याप्त होती थी। नवरात्र अनुष्ठान के दिनों में तो जगह की तंगी और भी ज्यादा रहती थी। लेकिन दोनों आगंतुकों के आने की सूचना जैसे पहले ही पहुंच गई थी और उनके लिए व्यवस्था पहले से ही थी। उन्हें ठहरने में जरा भी समय नहीं लगा। आधा- पौन घंटे के लिए सुस्ताए ही होंगे कि गुरुदेव ने अपने पास बुला लिया। ऋषि को शांतिकुंज पहुँचकर प्रतीत हुआ कि उनके गुरु ने कहाँ भेजा है? अपने गुरु के मुख से वह इस स्थान, क्षेत्र, विद्या-परंपरा के अधिष्ठाता के बारे में यदा- कदा सुनते रहते थे, लेकिन उस संस्थान की झलक पहली बार देखी थी। गुरुदेव के पास पहुँचकर दोनों ने श्रीचरणों में प्रणाम किया और अपने आने का उद्देश्य बताया। ऋषि को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। वह प्रणाम करके बैठे ही थे कि कुशलक्षेम के बाद राधिका जी ने कहा-“महाराजश्री ने ऋषि जी को कुछ समय के लिए आपके सान्निध्य में भेजा है। मैं दो-चार दिन के लिए बाहर रहूँगा लौटते आप आज्ञा देंगे और महाराजश्री कहेंगे तो मैं इन्हें वापस लेता जाऊँगा ।”

गुरुदेव ने राधिका जी से कुशलक्षेम पूछने और स्वामी अखंडानंद जी का स्मरण करते हुए राधिका जी की बात सुनी। उन्होंने स्वामी अखंडानंद सरस्वती के संबंध में चर्चा की। उनका कुशलक्षेम पूछा और अपने प्रति उनके स्नेह उल्लेख भी किया। सामान्य चर्चा के बाद उन्होंने बिना किसी संदर्भ के कहा-“इन दिनों स्थितियाँ इतनी विषम और विकट हैं कि अवतारी सत्ता ही उन्हें साध और सँभाल सकती है। भगवान अपनी प्रिय सृष्टि को ज्यादा समय तक हेय स्थिति में पड़े नहीं रहने देंगे। शास्त्रों और सिद्ध पुरुषों अवतार के लिए उपयुक्त समय और स्थितियों के लिए लक्षण बताए हैं, वे इन्हीं दिनों प्रकट होते दिखाई भी दे हैं। कठिनाई एक ही है कि भगवान अपनी सूक्ष्मसत्ता को अवतारी रूप में प्रकट कर भी चुके हों तो पहचाने कौन? उसके लिए अंतर्दृष्टि और निर्मल विवेक चाहिए। अन्यथा भगवान राम और कृष्ण को भी लोगों ने साधारण मानव, वनचारी और ग्वाल-बाल कहा था।”

Avtar Prakriya ka Rahasya

गांधी जी जब यरवदा जेल में कैद थे तो जेल सुपरिन्टेंडेंट ने उन्हें सभी आवश्यक सामान पहुँचाया। सरकार ने उनके खरच के लिए 150 रुपये मासिक की व्यवस्था की थी। सुपरिन्टेंडेंट ने उसे बढ़ाकर 300 रुपये कर देने की सिफारिश भेजी और कहा- “इतने बड़े नेता के लिए इतना तो होना ही चाहिए।”

गांधी जी ने मात्र 35 रुपये मासिक में काम चलाया और कहा “मुझे औसत भारतीय के स्तर का भी तो ध्यान रखना है।” इस आस्था ने गांधी जी को राष्ट्र का बापू बना दिया।

वर्तमान समय अनमोल है

vartmaan samay anmol hai

वर्तमान समय अनमोल है, वर्तमान समय ही यथार्थ है। वर्तमान समय ही कर्म का आधार है। वर्तमान समय ही एकमात्र हमारे साथ है, वर्तमान समय ही भविष्य का जन्मदाता है और अतीत के कारण उपस्थित है इसलिए वर्तमान समय बहुत खास है और जो इस वर्तमान समय में रहता है, जो इस वर्तमान के क्षणों का महत्त्व समझता है, वह वर्तमान की अमूल्यता को अनुभव कर लेता है।

कालगणना की सुविधा की दृष्टि से हम समय को मुख्यतः तीन भागों में बाँटकर देखते हैं-अतीत, वर्तमान और भविष्य। अतीत और भविष्य के दिनों के लिए एक ही शब्द ‘कल’ का उपयोग किया जाता है अर्थात अतीत और भविष्य दोनों अलग-अलग नहीं, बल्कि लगभग एक हैं। दोनों का मूलतत्त्व एक ही है, फरक केवल स्थान का है कि एक हो चुका है और दूसरा होने वाला है। ये दोनों अर्थात अतीत और भविष्य, एकदूसरे से इतनी निकटता से किसी गाँठ की तरह बँधे हुए हैं कि ये अलग-अलग होकर भी एक ही हैं।

vartmaan samay anmol hai

अतीत, वर्तमान और भविष्य-इन तीनों में मुख्य कौन है? तो वह है-वर्तमान। यह वर्तमान का क्षण ही अतीत और भविष्य का जन्मदाता है। बीता हुआ कल भी कभी वर्तमान था और जो आने वाला कल है, वह भी वर्तमान के स्पर्श करने के बाद अतीत बन जाएगा अर्थात वर्तमान ही अतीत और भविष्य की विभाजन रेखा है, जिसके एक तरफ अतीत है और दूसरी तरफ भविष्य है।

वर्तमान के अतिनिकट होते हुए भी हम अतीत में कुछ हस्तक्षेप नहीं कर सकते; क्योंकि वह समय हमारे हाथों से निकल चुका है। अतीत के समय में हम तभी कुछ कर सकते थे, जब वह वर्तमान के धरातल पर था अर्थात वह समय हमारे हाथों में था। वास्तव में हमारा सारा अतीत हमारे अपने सारे वर्तमान का ही तो संचयन है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हमारा अतीत सुखद बने, तो यह केवल अपने वर्तमान के प्रत्येक पल को सुखद बनाकर ही किया जा सकता है; क्योंकि प्रत्येक गुजरता हुआ पल तत्काल अतीत में तब्दील होता रहता है। जिसे हम अपनी स्मृति कहते हैं, वह हमारा अतीत है, जो हमारे मस्तिष्क में दर्ज है, जिसे हम जब-तब याद करके फिर से जीने की कोशिश करते हैं। इसलिए यदि हमारी यादें अच्छी हैं, तो हमारा जीवन भी निश्चित रूप से अच्छा होगा।

भविष्य की भी सोचे

अतीत, वर्तमान के बाद फिर भविष्य की बारी आती है। भविष्य का यथार्थ यह है कि यह अभी आया नहीं है, लेकिन आएगा। अतीत को चूँकि हमने ही बनाया है, हमारे ही कर्मों ने उसे आकार दिया है, इसलिए वहाँ सब कुछ यथार्थ में घटित हुआ है; लेकिन भविष्य के साथ ऐसा कुछ नहीं है। भविष्य के बारे में जो कुछ भी है, वह सब काल्पनिक है। भविष्य के बारे में हमारी जो भी सोच है, वह सब मन की रंगीन तरंगें हैं, या आशंकाओं के उलझे सुलझे विचार हैं । भविष्य के बारे में हम तब तक कुछ नहीं कर सकते, जब तक कि भविष्य के क्षण वर्तमान के क्षणों में परिवर्तित नहीं हो जाते।

हाँ, भविष्य के बारे में इतना जरूर है कि वर्तमान में हम जो कुछ भी कर रहे होते हैं, वह सब भविष्य के लिए ही कर रहे होते हैं, इसलिए मनोवांछित भविष्य को यथार्थ में बदलने के लिए हम वर्तमान पर लगातार हस्तक्षेप करते रहते हैं, ताकि हम जैसा चाहते हैं, वैसा भविष्य हमें मिल सके, लेकिन कई कोशिशों के बावजूद कभी-कभी हमारा भविष्य हमारी मरजी के अनुसार नहीं होता। हमें तब भी उसे स्वीकारना पड़ता है; क्योंकि भविष्य की नींव केवल हमारा वर्तमान ही निर्धारित नहीं करता, बल्कि अतीत भी निर्धारित करता है।

अतीत में किए जाने वाले हमारे शुभ व अशुभ कर्म हमारे शुभ व अशुभ भविष्य का निर्धारण करते हैं और यही कारण है कि कभी-कभी वर्तमान में अथक प्रयास करने के बावजूद हम मनोवांछित भविष्य नहीं प्राप्त कर पाते; क्योंकि अतीत के कर्म ही हमारे भविष्य को आकार देते हैं।

चूँकि हमारे ही कर्म हमारा अतीत बनते हैं और हमारे भविष्य का निर्धारण भी वे ही करते हैं, इसलिए गीता में बहुत ही उत्तम वचन कहा गया है-‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ अर्थात कर्म करने पर ही मनुष्य का अधिकार है, उसके फलों पर कभी नहीं और यह कर्म केवल वर्तमान में ही संभव है। अर्थात वर्तमान समय में ही मनुष्य को अपने कर्म करने का अधिकार है, न अतीत पर और न ही भविष्य पर उसका किंचित् भी अतिक्रमण है। अतः वर्तमान में रहना ही वास्तव में जीवन को जीना है।

दुर्भाग्यवश होता यह है कि वर्तमान समय में जीते हुए भी हम या तो अतीत की यादों में खो जाते हैं या फिर भविष्य की कल्पनाएँ हमारे मन को बहका लेती हैं। इस तरह हम वर्तमान में रह करके भी वर्तमान में अपने मन से पूरी तरह से जुड़े नहीं रह पाते, वर्तमान के क्षणों को हम पूरी तरह से नहीं जी पाते और न ही वर्तमान के क्षणों का पूरा सदुपयोग कर पाते हैं।

अधिकतर समय हम या तो अतीत की गलतियों या शाबाशियों को याद करते रहते हैं, उसमें या तो दुःख या खुशी अनुभव करते हैं या फिर भविष्य के लिए सुंदर कल्पनाओं का हवामहल तैयार करते रहते हैं, जिनका कोई आधार नहीं होता, जिन तक पहुँचने के लिए हमारे पास कोई सही रास्ता नहीं होता। यही कारण है कि हमारा भविष्य का हवामहल, भविष्य की हवाओं में ही कहीं गुम हो जाता है, यथार्थ के धरातल पर उतर ही नहीं पाता।

यदि हम अपने वर्तमान समय पर ध्यान दें, उसमें अपने मन को लगाएँ, अतीत की यादों और भविष्य की कल्पनाओं में अधिक समय न गँवाएँ तो निश्चित रूप से हमारा वर्तमान ही हमें हमारे इच्छित भविष्य की ओर ले जा सकता है। जब हम वर्तमान समय की बात करते हैं, तो उसका स्वरूप लंबाई या चौड़ाई में नहीं होता, वह तो एक छोटे बिंदु से भी छोटा होता है, लेकिन इसकी गहराई हमारे अनुमान से भी परे होती है।

इसलिए वर्तमान को यदि जीना है, तो इसकी गहराई में उतरकर ही इसे जीना संभव हो पाता है। इसे ही ‘ध्यान’ कहा गया है। ध्यान यानी हमारे विचारों का एक बिंदु विशेष पर टिक जाना। विचारों के रुकते ही हमारी चेतना में जीवन-ऊर्जा का संचयन होने लगता है। ऊर्जा की यही अधिकता व सघनता हमें वर्तमान की गहराई की यात्रा पर ले जाती है वर्तमान का यह अनुभव विचारों के द्वारा संभव नहीं हो सकता। इसके लिए उच्चस्तरीय संवेदनशीलता की जरूरत होती है और हम अपने मन को हृदय में विलीन करके इस संवेदनशीलता को प्राप्त कर सकते हैं।

हमारा हर वो श्वास, जिसे हम पूरे होशोहवास में ले रहे हैं और उसे छोड़ रहे हैं, वह हमें हमारे वर्तमान का एहसास कराता है। वर्तमान के एहसास के साथ, उसकी गहराई में जाना और उसे जीना ही वर्तमान के क्षणों को वास्तव में जीना है, जो हमारे अतीत और भविष्य दोनों को उत्तम बनाता है। एक सुखी एवं सफल जीवन को जीने का यही सूत्र है।

वर्तमान समय अनमोल को इस कहानी से समझे

एक धनी व्यक्ति बहुत कंजूस था। उसने घर की स्त्रियों को भी कुछ दान देने से मना कर रखा था। एक दिन एक भिखारी उसके यहाँ भीख माँगने आया तो धनिक की नवविवाहिता पुत्रवधू भिखारी से बोली-“हमारे यहाँ तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।” भिखारी बोला “फिर तुम लोग क्या खाते हो ?’ वह बोली-“हम बासी खाना खाते हैं, जब यह भी समाप्त हो जाएगा तो हम भी तुम्हारी तरह भीख माँगेंगे।”

सेठ ऊपर बैठा भिखारी व पुत्रवधू की बातें सुन रहा था। उसने अपनी पुत्रवधू से कहा तुम यह क्या कह रही हो कि हम भी भीख माँगेंगे।” पुत्रवधू बोली-“पिताजी हमारे पास अभी जो भी धन है, उसे हमने पिछले जन्म में किए गए परमार्थ कार्यों के पुण्यस्वरूप पाया है, परंतु अब हम परमार्थरूपी पुण्यकार्य नहीं कर रहे हैं, इसलिए पिछला पुण्य समाप्त होते ही हमें भीख माँगनी पड़ेगी।” सेठ को अपनी भूल का भान हुआ और उसका जीवन बदल गया।

आलस्य की महाव्याधि से कुछ ऐसे निपटें

alasya ki mahavyadhi se seekhe

मनुष्य जीवन अनेक महती संभावनाओं से भरा हुआ है, लेकिन बहुत ही कम लोग इसको समुचित दृष्टि से साकार कर पाते हैं। अधिकांशत: प्रतिभा एवं योग्यता होने के बावजूद आधा-अधूरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होते हैं व जीवन, बिना किसी सार्थक आंतरिक-बाह्य उपलब्धि एवं निष्कर्ष के ऐसे ही बीत जाता है। इस त्रासदी का मुख्य कारण रहता है-आलस्य, जिसे मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु की संज्ञा दी गई है।

आलस्य की महाव्याधि से कुछ ऐसे निपटें

आलस्य जड़ता एवं बेहोशी का प्रतीक है, जो व्यक्ति को वर्तमान में नहीं जीने देता। इसके आगोश में व्यक्ति या तो बीती यादों की खुमारी में डूबा रहता है या भविष्य के कोरे स्वप्नों में खोया रहता है। वह कुछ करना नहीं चाहता। बाहर से देखने पर वह निश्चित निर्देशक दिख सकता है, लेकिन अंदर से वह इस अवस्था की स्थिरता, शांति एवं चेतनता से वंचित होता है। आलस्य में विघ्न एक आलसी को खलल जैसा प्रतीत होता है। अपनी इच्छा से वह आलस्य से बाहर नहीं निकलना चाहता।

ऐसे में आलसी उस पुरुषार्थ से वंचित रह जाता है, जो जाग्रत संकल्प से उद्भूत होता है, जो चुनौतियों को अवसर में बदलने का साहस रखता है। जो विषम परिस्थितियों के बीच भी अपना लक्ष्य सिद्ध करना जानता है। आलसी में उस जागरूकता का अभाव रहता है, जो सामने आ रहे अवसरों को समझ सके। आगे बढ़ने के मौके सामने आते रहते हैं, लेकिन आलसी मूकदर्शक बनकर इनका लाभ उठाने से चूक जाता है। इस तरह आलस्य की जड़ता में व्यक्ति आंतरिक और बाहरी संभावनाओं को साकार नहीं कर पाता।

alasya ki mahavyadhi se seekhe

आलस्य के कई कारण हो सकते हैं-(1) बहुत ज्यादा शारीरिक श्रम (2) मानसिक श्रम से उपजी हुई थकान (3) इंद्रिय असंयम (4) स्वभावगत आलस्य आदि। इनमें से पहले दो कारण तो परिस्थितिजन्य हैं, जिनसे हुए ऊर्जा-क्षय की उचित विश्राम, निंद्रा एवं आहार-विहार के साथ भरपाई हो जाती है, जिसके बाद फिर व्यक्ति आलस्य से उबर जाता है और अपने कार्य में सक्रिय हो जाता है ।

तीसरा कारण व्यक्ति की बिगड़ी आदतों से जुड़ा है, जिन्हें सुधारकर ही ठीक किया जा सकता है। सबसे अधिक घातक होता है स्वभावगत आलस्य, जिससे उबरता अत्यंत कठिन होता, लेकिन असंभव नहीं।

आलस्य से निपटने के लिए विभिन्न स्तरों पर निम्न तरीकों को अपनाने का क्रम कुछ इस तरह बनाया जा सकता है

(1) हलका आहार लें-भारी आहार आलस्य का प्रमुख कारण रहता है। कहावत भी है कि पेट भारी तो मन भारी। ऐसे में 3-4 घंटों के अंतराल में अपनी स्थिति के अनुरूप हलका आहार लिया जा सकता है। स्वल्पाहार जहाँ पेट को हलका रखता है, वहीं इससे प्राप्त ऊर्जा व्यक्ति को सक्रिय रखती है।

(2) चहलकदमी करें-जब काम करते-करते थक जाएँ या आलस्य हावी होने लगे, तो उठकर टहलना आलस्य दूर करने में सहायक होता है। 10-15 मिनट टहलना थकान को मिटाते हुए नवीन ऊर्जा का संचार करता है। साथ ही गहरा श्वास लेने का अभ्यास भी किया जा सकता है।

(3) पर्याप्त नींद लें-नींद का पूरा न होना भी आलस्य का एक कारण बनता है। अत: गहरी नींद व्यक्ति को तरोताजा बनाए रखती है व आलस्य का कारण निरस्त हो जाता है। अत: समय पर सोएँ व जागें, दिन में न सोएँ। नींद से पहले विश्राम कर शांतिपूर्वक सोने जाएँ ।

(4) भरपूर पानी पीएँ-पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) भी आलस्य का कारण बन सकती है। ऐसे में नियमित अंतराल पर जल लेते रहें तथा दिनभर में जल की पर्याप्त मात्रा लें, जिससे कि शरीर के विजातीय तत्त्वों का शोधन होता रहे व व्यक्ति तरोताजा अनुभव करे।

(5) दिनचर्या रखें संयमित-संतुलित-असंयमित व असंतुलित दिनचर्या आलस्य का एक प्रमुख कारण है; क्योंकि इससे शारीरिक एवं मानसिक ऊर्जा का क्षय होता है। अतः दिनचर्या को संयमित व संतुलित रखकर हम थकान से बखूबी निपट सकते हैं।

(6) ताजगी के छोटे-छोटे प्रयोग-सुबह बिस्तर से उठकर मॉर्निंग वॉक करें। मौसम को देखते हुए ठंढे जल से स्नान कर सकते हैं। आँखों पर ठंढे पानी के छींटे बहुत सहायक होते हैं। मौसम के अनुरूप ताजगीवर्द्धक गरम या ठंढे पेय का सेवन भी किया जा सकता है।

(7) तनाव का सामना करें-तनाव के कारण भी ऊर्जा का भारी क्षय होता है। ऐसे में हलकी-फुलकी गतिविधियों में शामिल रहकर इससे निपट सकते हैं। नियमित योग का अभ्यास कर सकते हैं। मधुर संगीत का श्रवण व मित्रों का संग-साथ भी बहुत सहायक रहता है।

(8) श्रम की अति से बचें, कार्य को टुकड़ों में बाँटें-जहाँ तक संभव हो कार्य करने का संतुलित तरीका अपनाएँ । कार्य को बोझ की तरह करने के बजाय व्यवस्थित तरीके से करें। बड़े कार्य को टुकड़ों में बाँटकर बीच-बीच में विश्राम भी लें। साथ ही कार्य को बदलें व इसमें नयापन लाते रहें।

(9) लक्ष्य में रुचि रखें, मनपसंद कार्य करते रहें आलस्य का एक अहम कारण कार्य के प्रति अरुचि भी है। रुचि न होने के कारण व्यक्ति कार्य में टालमटोल करता रहता है, जो आलस्य का एक बड़ा कारण बनता है। अतः रुचिकर लक्ष्य को हाथ में लें, या कार्य को रोचक बनाएँ। आप देखेंगे कि आलस्य कैसे विदा हो जाता है।

इस तरह व्यक्ति अपनी स्थिति के अनुरूप रणनीति बनाकर आलस्यरूपी महाव्याधि से निपट सकता है।

आलस्य की महाव्याधि को इससे समझे

मानवीय गरिमा पर प्रकाश डालते हुए मानसकार ने राम के चरित्र के माध्यम से बड़ी अच्छी व्याख्या की है। नागरिक कर्तव्यों का पालन उतना भर है कि हम अपने उत्तरदायित्व को निबाहें और दूसरों के अधिकारों का व्यतिक्रम न करें, पर सज्जनों की शालीनता इससे भी आगे बढ़ जाती है । वे अपने उदार व्यवहार से दूसरों के सामने आदर्श उपस्थित करते हैं और अनुकरण की प्रेरणा देते हैं। मनुष्यता का गौरव बढ़ाने वाले विभूतियों को समाज का ऋण और अमानत मानते हैं और उनका सदुपयोग लोक-मंगल के लिए करते हैं

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ कीर्ति ( प्रभाव), कविता (साहित्य) और संपत्ति वही श्रेष्ठ है, जो गंगा जी की तरह सबका भला कर सके अर्थात जो विभूतियाँ लोकहित में न लग सकें । वे निकृष्ट हैं। विभूतिवानों को जो विशेषताएँ ईश्वर ने दी हैं उन्हें भगवान की धरोहर मानकर लोक-कल्याण में ही उनका प्रयोग करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक मात्रा में जमा संपत्ति का यही सदुपयोग है कि उसे जल्दी सत्प्रयोजनों के लिए वितरित कर दिया जाए। रावण ने प्रचुर संपत्ति जमा कर रखी थी। सिंहासनारूढ़ होने पर वह विभीषण को मिली। इस संचय के धन का क्या किया जाए? यह बात उन्होंने श्रीराम से पूछी। राम ने उसे तुरंत वितरण करके संग्रह के पाप का तत्काल प्रायश्चित करने की सलाह दी। तदनुसार वह संपदा आवश्यकता वाले लोगों एवं कार्यों के लिए अविलंब दे दी गई।

ध्यान के अभाव में पनपता मनोविकार

dhyan ke abhaw me panpta manovikar

हमारे मन का स्वभाव चंचल है, इसलिए हमारा मन आसानी से स्थिर व एकाग्र नहीं हो पाता और यदि स्थिर होता भी है, तो वह आसानी से भटक भी जाता है। सामान्य जीवन में मन का अस्थिर होना, मन का भटकना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन यदि मन की यह अस्थिरता बहुत ज्यादा हो, तो इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है; क्योंकि मन का अस्थिर होना भी एक प्रकार का मनोविकार है, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार’ कहा जाता है।

यह एक मनोवैज्ञानिक व मानसिक समस्या है, जो आमतौर पर बच्चों व किशोरों में देखने को मिलती है। यदि सही समय पर इसका उपचार न किया जाए, तो वयस्क अवस्था में भी इसके लक्षण आ सकते हैं। शुरुआती दौर में कोई भी मनोविकार बहुत सामान्य लक्षणों के साथ शुरू होता है, लेकिन यदि इस पर गौर न किया जाए, इस पर ध्यान न दिया जाए, तो फिर इसके लक्षण धीरे-धीरे स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आने लगते हैं और अपने विकार की गंभीरता को दरसाते हैं। उदाहरण के लिए चिंता व तनाव हम सभी को होते हैं, लेकिन यदि आवश्यकता से अधिक चिंता व तनाव हमें घेरे रहते हैं, तो उनके कारण उनसे संबंधित मनोरोग हमारे अंदर पनप जाते हैं

dhyan ke abhaw me panpta manovikar

इसी तरह किसी का ध्यान न लगना और मन को सहजता से किसी कार्य में केंद्रित न कर पाना कोई विकार नहीं है, लेकिन जब यह प्रक्रिया हमारे स्वभाव का अंग बन जाए, हमें विचलित व परेशान करने लगे, तो यह धीरे-धीरे ध्यान अभाव अतिसक्रियता मनोविकार में तब्दील हो जाता है, जिसका उपचार करना जरूरी हो जाता है।

ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार के मुख्य लक्षण हैं-ध्यान देने में दिक्कत होना, आवेगी व्यवहार, असावधानी व अतिसक्रियता आदि। इस विकार से पीड़ित व्यक्ति में आत्मसम्मान की कमी, रिश्तों या संबंधों में तनाव एवं विद्यालय या कार्यस्थल पर कई तरह की परेशानियां आदि पनप जाते हैं। चूँकि ऐसे लोगों को ध्यान देने में दिक्कत महसूस होती है, इसलिए ये अपने कार्यों एवं गतिविधियों का संचालन मुश्किल से कर पाते हैं।

इस विकार के कारण बच्चों को अपने विद्यालय में मिलने वाले ऐसे कार्य, जिनमें उनकी रुचि नहीं होती, उने पूरा करना बहुत मुश्किल लगने लगता है। वयस्कों में बह विकार होने पर वे ऐसी परिस्थितियों में भी व्यग्र होने लगते है हैं, जो बहुत सामान्य होती हैं। इस विकार से ग्रसित व्यक्ति आवेगपूर्ण स्थिति में एक स्थान पर कुछ समय के लिए। निश्चित होकर बैठ नहीं सकता और स्थिति प्रतिकूल होने पर वह अपना स्थान ही छोड़ देता है।

छोटी-सी बात पर भी खतरनाक जोखिम

ऐसे लोग छोटी-सी बात पर भी खतरनाक जोखिम ? उठाने को तैयार हो जाते हैं या किसी भी बात पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं, विलकुल भी धैर्य नहीं रखते हैं और न ही कुछ करने से पहले सोच-विचार करते हैं। ऐसे व्यक्ति को किसी कार्य के लिए अपनी बारी का इंतजार करना मुश्किल प्रतीत होता है। ऐसे लोग बातचीत करने में हमेशा बाधा डालते हैं और जबरदस्ती किसी भी मुद्दे को लेकर उस बहस करने लग जाते हैं।

ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार ज्यादातर आनुवांशिक होता है। हालाँकि कुछ अन्य कारण भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। जैसे यह विकार मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटर्स के असंतुलन के कारण या उनके ठीक तरह से कार्य न कर पाने के कारण भी होता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो बच्चे अविकसित या कम वजन के साथ पैदा होते हैं या जिन बच्चों को मिरगी (एपीलेप्सी) के दौर पड़ते हैं, उन्हें भी यह दिक्कत अधिक होती है। मस्तिष्क किसी कारण से क्षति होने या मस्तिष्क में चोट ( गर्भावस्था में या पैदा होने के बाद) लगने वाले बच्चों में इस विकार के होने की आशंका ज्यादा होती है।

बच्चों में मनोचिकित्सक या बालरोग विशेषज्ञ

बच्चों में इस विकार की पहचान बाल मनोचिकित्सक या बालरोग विशेषज्ञ ही कर पाते हैं। कभी-कभी ऐसे बच्चे माता-पिता के लिए बहुत परेशानी का कारण बन जाते हैं। किशोरों में इस विकार से पीड़ित होने पर सड़क दुर्घटना में घायल होने की प्रवृत्ति ज्यादा रहती है। यह विकार लोगों को इतना सामान्य प्रतीत होता है कि इसकी पहचान मुश्किल से तब हो पाती है, जब इस विकार के लक्षण बहुत बढ़ जाते हैं और कई तरह की समस्याएँ पैदा करने लगते हैं । इस विकार के जटिल होने पर बच्चों या किशोरों को अपनी पढ़ाई भी छोड़नी पड़ सकती है। इस विकार से ग्रसित वयस्कों की मानसिक क्षमताएं कमजोर हो जाती हैं। इस विकार से ग्रसित कई लोग शराब या अन्य नशीली वस्तुओं का उपयोग करने लगते हैं, जिससे उनकी सामाजिक छवि भी खराब होने लगती है

इस विकार के उपचार के लिए परामर्श, जीवनशैली में बदलाव व दवाओं का प्रयोग किया जाता है। जिन बच्चों में इसके लक्षण गंभीर होते हैं, उनमें दवाओं के द्वारा ही शुरुआती उपचार किया जाता है तथा किशोरों व वयस्कों में भी उपचार का यही तरीका अपनाया जाता है।

ध्यान अभाव अतिसक्रियता मनोविकार में चूँकि ध्यान का अभाव होता है और व्यक्ति में अतिसक्रियता होती है, वह एक जगह पर स्थिर नहीं रह पाता लेकिन यदि इस विकार से ग्रसित व्यक्ति योगासनों का नियमित अभ्यास करे और धीरे-धीरे प्राणायाम का अभ्यास करते हुए ध्यान करने की कोशिश करे, तो उसे इस मनोविकार को नियंत्रित करने व ठीक करने में लाभ मिल सकता है।

इसके अलावा इस मनोविकार से ग्रसित बच्चों व किशोरों को मंत्रों का उच्चारण सिखाना चाहिए: क्योंकि मंत्रों के उच्चारण मात्र से हमारे मस्तिष्क में ऐसी ऊर्जा * का प्रवाह होता है, जो हमारे ध्यान को एकाग्र करने में सहायक होती है। देखा गया है कि गायत्री मंत्र की नियमित उपासना ऐसे में अत्यंत प्रभावी परिणाम ले करके आती है। इसके अतिरिक्त बच्चों व किशोरों को सरल स्तुतियाँ, स्तोत्र, श्रीरामचरितमानस की चौपाइयाँ आदि भी सिखाई जा सकती हैं; क्योंकि इन सबमें देवी देवताओं की सूक्ष्म ऊर्जा का निवास होता है, जो हमारे मनोविकारों को दूर करती है हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है और हमें प्राण ऊर्जा से भरपूर करती है।

ध्यान अभाव अतिसक्रियता विकार के लक्षण यदि किसी में दिखें तो उसे ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिनको करने के लिए शारीरिक व मानसिक गतिविधियों की जरूरत हो और उस कार्य में उसकी रुचि भी हो। इसके साथ ही उसकी काउन्सिलंग करना भी जरूरी है, उसके मन की बात समझना जरूरी है; क्योंकि जब मनोग्रंथियाँ खुलती हैं तो व्यक्ति उन्मुक्त होकर अपना कार्य कर पाता है और अपने मन को एकाग्र करने की कला भी सीख पाता है।

ध्यान के अभाव में पनपता मनोविकार उदाहरण से समझे

एक व्यक्ति बाण बनाने की कला में पारंगत था। उसके बनाए बाण अद्भुत होते थे इस कला को सीखने एक लोहार भी उसके पास पहुँचा। उसने पास बैठकर गंभीरता से उसकी कार्यपद्धति देखने के लिए कहा। एक बरात सामने की सड़क से गाजे-बाजे के साथ निकली। लोहार ने उसका विवरण उस व्यक्ति को सुनाया। बाण बनाने वाले ने कहा-“न तब मुझे देखने की फुरसत थी और न अब सुनने की। समग्र तत्परता और अभिरुचि के साथ काम करना, यही उसे अद्भुत बना लेने का रहस्य है।” सीखने वाला समझ गया और एकाग्रता का अभ्यास करने लगा। जितनी सफलता मिली, उतने ही उत्तम बाण बनाने लगा। वस्तुतः यही आदर्श हर विद्याव्यसनी पर भी लागू होता है। शिक्षण हेतु सूत्र कहीं से भी मिलें, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए।

उपासना से बदलेगा जमाना

upasna se badlega jamana

गायत्री की उपासना के माध्यम से अपने जीवन को कल्पवृक्ष के सदृश बना लेने वाले परमपूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व में अगणित उन सिद्धियों का समावेश था, जिनका उल्लेख भारतीय दर्शन के अनेक साधना ग्रंथों में पढ़ने को – मिलता है। उन सिद्धियों के विषय में पढ़ते तो सभी हैं, टीवी सीरियलों में वैसा अभिनय करने वाले भी अनेकों मिल जाते : हैं, पर वैसे व्यक्तित्वों को सशरीर देख पाने को लगभग हर कोई तरसता नजर आता है।

ऐसा सौभाग्य गायत्री परिजनों को मिल सका; क्योंकि उनका स्वयं का जीवन उन सारे सिद्धांतों का प्रकट प्रमाण था, जिन्हें गायत्री-उपासना के माहात्म्य के साथ जोड़ करके देखा जाता रहा है। अपने 80 वर्षों के जीवन को उन्होंने जिस कसौटी पर कस करके जिया और परिणाम में जिस तरह के चमत्कार सर्वत्र देखने को मिलते हैं, वह एक खुली किताब की तरह से है। उससे मार्गदर्शन प्राप्त करके कोई भी, कभी भी साधना से सिद्धि संबंधी उक्ति को चरितार्थ होते देख सकता है।

upasna se badlega jamana

गायत्री की उपासना के माध्यम से समस्त विश्व के कल्याण का पथ किस तरह से प्रशस्त किया जा सकता है-इस विषय में पूज्यवर अनेक जगहों पर अनेक बार बोले होंगे। क्षेत्र से आए परिजनों से हुई एक मुलाकात पर हुई चर्चा के संस्मरण को कुछ ऐसे ही भाव के साथ देखा जा सकता है। घटना संभवतया सन् 1980 की रही होगी। परमपूज्य गुरुदेव कुछ शक्तिपीठों की प्राणप्रतिष्ठा का क्रम संपन्न करके वापस शांतिकुंज लौटे ही थे कि मध्य प्रदेश के कुछ कार्यकर्ताओं का एक समूह भी उनसे मिलने को पहुँचा। आते से ही उन्होंने पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी से यह साझा किया कि शांतिकुंज में प्रवेश करते ही कैसी दिव्यता का आभास उन लोगों को होता है।

उनकी बातें सुनकर परमपूज्य गुरुदेव मुस्कराए और बोले-” बेटा! यह शांतिकुंज एक साधारण स्थान नहीं है। यह आदिशक्ति गायत्री का साक्षात् निवासस्थान है। वर्तमान समय में महाकाल मानवीय चेतना में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहते हैं। यदि मानवीय चेतना का, मनुष्य की मन:स्थिति का रूपांतरण हो गया तो धरती पर स्वर्ग स्वतः ही आ जाएगा। ऐसा कहते हुए पूज्य गुरुदेव बोले-“बेटा। चाहे शांतिकुंज की स्थापना का संकल्प हो या गायत्री की उपासना का प्रयोग-ये जितने भी निर्धारण हैं, ये इसी एक लक्ष्य को केंद्र में रखकर लिए गए हैं। धर्मतंत्र से लोक शिक्षण से लेकर शांतिकुंज की स्थापना तथा तीर्थों की प्रसुप्त चेतना जगाने से लेकर भारतभूमि की देवात्मा शक्ति से १? कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया हमारे द्वारा इसी उद्देश्य से संपन्न की गई है। इन सब प्रयोगों के पीछे शक्ति आद्यशक्ति माँ गायत्री की ही काम कर रही है।”

क्षेत्र से आए कार्यकर्त्ताओं के मनों को ये शब्द हिलाकर रख रहे थे वे स्तब्ध होकर इन बातों को सुन रहे थे। परमपूज्य गुरुदेव थोड़ा रुके, कुछ अन्य परिजन जो दूसरे स्थानों से आए थे, उनसे बातचीत की और फिर इस समूह को संबोधित करते हुए बोले ” बेटा ! इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि सारे वातावरण को ही गायत्रीमय बना दिया जाए। गायत्री-उपासना चिरकाल से ही इस देश को शक्ति व सामर्थ्य प्रदान करती रही है। इस युग के लिए तो वह संजीवनी बूटी की तरह से है। गायत्री – उपासना के माध्यम से यदि वातावरण को संस्कारित करने का कार्य कर लिया गया तो उससे जो प्रकाश व पुण्य जन्म लेगा, वह राष्ट्र व विश्व को संयत, स्वस्थ व समर्थ देवभावनाओं से ओत-प्रोत रखने का गतिचक्र अपने आप चलने लगेगा ।

उपासना से बदलेगा जमाना

गुरुदेव प्रवाह में अपनी बातें कहे जा रहे थे और वहाँ बैठे लोग शांत व स्थिर होकर उस दैवी ऊर्जा की उपस्थिति को निरंतर महसूस कर रहे थे गुरुदेव आगे बोले-” ये जो गायत्री उपासना के केंद्र हैं, शक्तिपीठें हैं, प्रज्ञापीठें हैं, प्रज्ञा संस्थान हैं-इनकी स्थापनाएँ भारत के कोने-कोने में करना जरूरी हैं; क्योंकि इनके माध्यम से दर्शवादी सत्प्रवृत्तियों का एक प्रवाह आने वाले दिनों में जन्म लेगा. जो संपूर्ण विश्व को मथ करके रख देगा। सच पूछो तो इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नए सिरे से लिखा और गढा जा रही है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों-लाखों वर्षों के बाद ही आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं, वे अपने आप को सदा-सर्वदा के लिए अजर-अमर बना जाते हैं।”

परमपूज्य गुरुदेव आगे कहने लगे-” बेटा! गायत्री की उपासना ही ये सब कर पाने में समर्थ है गायत्री की उपासना को ही तुम सच्ची आध्यात्मिकता कह सकते हो। आज के समय में आध्यात्मिकता का अर्थ लोग बाजीगरी से लेते हैं और सिद्धियों का तात्पर्य एक ऐसे अजूबे से निकालते हैं, जो कौतुक पैदा करता हो चाहे वह निरर्थक ही क्यों न हो। यदि किसी ने हाथ में से बालू निकाल भी दी तो उससे समाज का क्या भला हो जाता है ? हवा में हाथ मारकर इलायची या मिठाई मँगा देने जैसे काम गायत्री-उपासकों के जीवन-पथ का अंग नहीं हैं। गायत्री की उपासना तो सच्चे अर्थों में साधना करने पर बहुमूल्य सिद्धि प्रदान करती है।”

कुछेक के मन में जिज्ञासा उभरी कि गायत्री- उपासना करने से कौन-सी सिद्धि साधक को मिलती है तो गुरुदेव विशिष्ट कार्यों से है, जिनका संबंध लोक-मंगल से है। ये कार्य इतने बड़े, भारी व व्यापक होते हैं कि एकाकी संकल्प के द्वारा अनेकों बार उन्हें कर पाना संभव नहीं होता, तब भी वे पूर्ण विश्वास के साथ उसे करने को आगे बढ़ते हैं और सफल भी होते हैं। ऐसा महती पुरुषार्थ गायत्री-साधना द्वारा ही संभव है और ऐसे विशाल कार्य का नाम ही युग-परिवर्तन है।”

इतना कहते-कहते परमपूज्य गुरुदेव अपने स्थान पर खड़े हुए। वातावरण की नीरवता उनके खड़े होने से भंग हुई और जो परिजन लगभग भावसमाधि की अवस्था में पहुँच गए थे, वे चैतन्य से होने लगे। गुरुदेव का खड़ा होना उनके लिए इशारा था कि वे अब दूसरे क्रम के लिए निकल रहे थे पर साधकों का यह समूह अपने जीवन के लिए एक महत्त्वपूर्ण दिशा को पा चुका था।

उपासना की इस कहानी से समझे

ऐंजिल डेविस बर्मिंघम के निकट एक छोटे देहात में जन्मीं अश्वेत परिवार में जन्मने के कारण उन्हें भी उन अभावों और अपमानों का सामना करना पड़ा, जो पददलित जातियों को करना पड़ता है। बचपन अध्ययन में बीता। उन्होंने एम.ए., पी एच.डी. किया। एक स्कूल में अध्यापिका बन गईं, पर इतना ही उनके लिए सब कुछ नहीं था। वे अपने जातीय पददलितों को मानवोचित अधिकार दिलाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने मार्टिन लूथर किंग के साथ मिलकर कितने ही रचनात्मक और संघर्षात्मक आंदोलनों में हिस्सा बँटाया।

विवाह का विचार ही उन्होंने छोड़ दिया। आंदोलनकारियों के सामने इतने महत्त्वपूर्ण काम रहते हैं कि वे विवाह-बंधन में बँधे तो उनकी आधी शक्ति तो घरेलू झंझटों में ही खप जाती है। फिर वे न घर से बाहर रह पाते हैं और न अर्थोपार्जन की जिम्मेदारियों से बच पाते हैं। उन्हें लूथर किंग के दाहिने हाथ की तरह काम करना था। डेविस दृढ़निश्चयी थीं। अध्ययनकार्य के उपरांत उनका सारा समय समाजसुधार के काम में ही लगता था। वे कुछ ही घंटे सो पाती थीं आएदिन उन्हें गोरे किसी-न-किसी षड्यंत्र का शिकार वे बनाते रहे। इन सबसे भी वे जूझती रहीं, पर चेहरे पर उदासी कभी नहीं आने दी। उनका जीवन अनेकों के लिए उदाहरण है।