Berojgari ka samadhaan

बेरोजगारी का समाधान है स्वावलंबन

भारत में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है, जो की सब जानते है लेकिन इसका समाधान बहुत कम लोगो जानते है, इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए हम आज बेरोजगारी का समाधान है बता रहे है.

सुशासन की परिकल्पना से पोषित सरकार ने अच्छी पहले के साथ देश में मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया स्टार्टअप एंड स्टैंडअप इंडिया आदि को लेकर पूरी ताकत झोंकी, परंतु तब भी रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट इस मामले में मायूसी से भरे इशारे पहले भी कर चुकी थी।

इसकी मानें तो सन् 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या सन् 2016 की तुलना में थोड़ी बढ़ी थी; जबकि सन् 2018 में भी यही क्रम जारी रहा। बेरोजगारी का आकलन सन् 1972 में शुरू हुआ। मौजूदा हालात बेरोजगारी दर के लिए सर्वाधिक माने जा रहे हैं।

एनएसएसओ की रिपोर्ट यह दरसाती है कि वर्तमान समय में बेरोजगारी तुलनात्मक रूप से कहीं अधिक बढ़ी है। महिला कामगार सबसे ज्यादा बेरोजगारी की शिकार हुई हैं। सेंटर फॉर दि मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) का सर्वेक्षण कहता है कि बढ़ती हुई बेरोजगारी का आँकड़ा 6.9 फीसदी तक जा चुका है।

इसी की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले दो वर्षों में एक करोड़ दस लाख नौकरियाँ खतम हो चुकी हैं। इंडियन मैन्यूफैक्चरिंग ऑर्गेनाइजेशन और कंफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री ने भी बताया है कि बड़ी तादाद में नौकरियाँ खतम हुईं।

उक्त सर्वे कुछ तो हकीकत से युक्त होंगे ऐसा प्रतीत होता है। नीति आयोग ने बेरोजगारी को लेकर सफाई दी थी कि बेरोजगारी के ऊँचे आँकड़े दिखाने वाली एनएसएसओ की रिपोर्ट अंतिम नहीं है, पर 45 सालों में सबसे ज्यादा बेरोजगारी के आँकड़े हमें कुछ और ही आईना दिखा रहे हैं।

बेरोजगारी का समाधान

अभी तक एक करोड़ के स्थान पर मैन्यूफैक्चरिंग, कन्स्ट्रक्शन तथा ट्रेड समेत 8 प्रमुख सेक्टरों में सिर्फ 2 लाख, 31 हजार नौकरियाँ ईजाद हुई हैं; जबकि सन् 2015 में यही आँकड़ा एक लाख, 55 हजार पर ही आकर सिमट गया था। हालाँकि सन् 2014 में 4 लाख, 21 हजार लोगों को नौकरी मिली थी। सन् 2009 में ही दस लाख से अधिक नौकरियाँ दी गई

जिस प्रकार रोजगार को लेकर स्थिति कमजोर दिखाई दे रही है; उससे तो यही लगता है कि रोजगार बढ़ाना तो दूर, लाखों खाली पदों को ही भर दिया गया होता तो भी गनीमत थी। आँकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि देश में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है, 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6 हजार से अधिक पद खाली हैं।

देश के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले आईआईटी आईआईएम और एनआईटी में भी हजारों पद रिक्त हैं । इंजीनियरिंग कॉलेज 27 फीसदी शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, जबकि 12 लाख स्कूली शिक्षकों की भी भरती जरूरी है।

रिक्तियों को बिना भरे रोजगार की समस्या

अब सवाल है कि महत्त्वपूर्ण रिक्तियों को बिना भरे रोजगार की समस्या, बेरोजगारी समेत कई बुनियादी मुद्दों पर किए गए प्रयास विफल प्रतीत हो रहे हैं। रोजगार के अवसर बढ़े-इसके लिए सरकार ने कौशल विकास मंत्रालय बनाया है। थर्ड और फोर्थ ग्रेड की सरकारी नौकरियों में धाँधली न हो, इसके लिए साक्षात्कार भी समाप्त किया है।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और सीएमआईआई के अनुसार मनरेगा के तहत रोजगार हासिल करने वाले परिवारों की संख्या 83 लाख से बढ़कर 1 करोड़ 67 लाख हो गई।

अब यह आँकड़े इससे भी ऊपर हैं। आँकड़ों से यह परिभाषित होता है कि ग्रामीण इलाकों में रोजगार मुहैया कराने को लेकर सरकार का जोर सफल हुआ है, परंतु पढ़े-लिखे युवाओं की स्थिति बेकाबू हुई है। भारत एक समावेशी विकास वाला देश है, इसलिए यहाँ बुनियादी समस्याएँ कदम-कदम पर चुनौती बनी हुई हैं।

ऐसे में युवा वर्ग बेरोजगारी को देर तक सह नहीं सकता तथा ऐसे में करोडों की तादाद में पढ़े-लिखों का सब्र भी जवाब दे रहा है। 65 फीसदी युवाओं वाले देश में शिक्षा और कुशलता के

स्तर पर रोजगार की उपलब्धता स्वयं में एक बड़ी चुनौती है। मुद्रा बैंकिंग के माध्यम से 12 करोड़ से अधिक लोनधारकों को रोजगार की श्रेणी में सरकार गिनती है, जो बात पूरी तरह गले नहीं उतरती; क्योंकि रोजगार के लिए लोन लेना इस बात का प्रमाण नहीं है कि सफलता भी सभी को इसी दर पर मिली होगी। जैसे देखें तो सन 2027 तक भारत सर्वाधिक श्रम शक्ति वाला देश होगा। अर्थव्यवस्था को गति बरकरार रखने के लिए रोजगार के मोर्चे पर भी खरा उतरना उतना ही जरूरी होगा

भारत सरकार के अनुमान के अनुसार सन् 2022 तक 24 सेक्टरों में 11 करोड़ अतिरिक्त मानव संसाधन की जरूरत होगी। ऐसे में पेशेवर कार्यकुशलता का होना उतना हो आवश्यक है। सर्वे कहते हैं कि शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी को स्थिति काफी खराब दशा में चली गई है। 18 से 29 वर्ष के शिक्षित युवा में बेरोजगारी दर 10.2 फीसदी जबकि अशिक्षितों में 2.2 फीसदी थी। ग्रेजुएट में बेरोजगारी की दर 18.4 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अब यह स्वाभाविक है कि भविष्य में अधिक-से-अधिक शिक्षित युवा श्रम संसाधन में तब्दील हों तभी बात बनेगी। यदि खपत सही नहीं हुई तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट भी बेरोजगारी के आँकड़ों को बढ़ते क्रम में आँक रही है। संभव है कि अभी राहत नहीं मिलेगी। देश में उच्च शिक्षा लेने वालों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 3 करोड़ से अधिक छात्र स्नातक में प्रवेश लेते हैं। 40 लाख के आस-पास परास्नातक पाठ्यक्रमों में नामांकन कराते हैं। जाहिर है कि एक बड़ी खेप यहाँ भी तैयार होती है जो रोजगार को लेकर उम्मीद पालती है। देश में पी-एच.डी. करने वालों की स्थिति भी रोजगार के लेकर बहुत अच्छी नहीं है। रोजगार कहाँ से बढ़े और कैसे बढ़े, इसकी भी चिता

स्वाभाविक है। इसमें दो राय नहीं कि सभी को सरकार नौकरी नहीं मिल सकती। ऐसे में स्वरोजगार एक बेहतर विकल्प है। रोबोटिक टेक्नोलॉजी से नौकरी छिनने का फिलहाल बरकरार है। इसमें संयम बरतने की आवश्यकता है। ऑटोमेशन के चलते इनसानों की जगह मशीनें लेती जा रही हैं।

इससे भी नौकरी आफत में है। छँटनी के कारण भी लोग दर-दर भटकने के लिए मजबूर हैं। जाहिर है जो संगठन के अंदर हैं, उन्हें बनाए रखा जाए और जो बेरोजगार बाहर घूम रहे हैं उनके लिए रोजगार सेक्टर में नए उप- सेक्टर सृजित किए जाएँ। विश्व बैंक भी कहता है कि भारत में आईटी इंडस्ट्री में 69 फीसदी नौकरियों पर ऑटमेशन का खतरा मैंडरा रहा है। सरकार को चाहिए कि ई-गवर्नेंस की फिराक में मानव संसाधनों की खपत को कमजोर न करें और बरसों से खाली पदों को तत्काल प्रभाव से भरे ।

रोजगार के लिए शिक्षित युवाओं को अपनी कुशलता से स्वावलंबी बनना चाहिए हमें सरकार या किसी और की ओर ताकते रहने की अपेक्षा अपने हुनर, श्रम और कुशलता पर विश्वास करना चाहिए। इस सोच से ही बेरोजगारी को परास्त किया जा सकता है।

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