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आध्यात्मिक संभावनाओं के अनावरण का विज्ञान

इस भाग दोड़ भरी दुनिया में हम अपने लिए समय नहीं निकाल पाते और और अपने अध्यात्म से दूर होते जाते है हमारा हमेसा से प्रयास रहा है की लोगो को अध्यात्म का मह्त्व बता सके. नीचे आपको आध्यात्मिक संभावनाओं के अनावरण का विज्ञान के बारे में विस्तृत जानकारी मिलेगी.

अध्यात्म हमारे स्वभाव से जुड़ी विद्या है। स्व के प्रति हमारा मूलभाव क्या है, इसी के अनुरूप हमारे विचार एवं व्यवहार का स्वरूप निर्धारित होता है। मानव प्रकृति के मर्मज्ञ ऋषियों के अनुसार हमारी मूलप्रकृति विशिष्ट है, विलक्षण है, दिव्य है, जिसका अनावरण अध्यात्म मार्ग पर बढ़ते हुए होता है। इसका शुभारंभ जीवन के मूलस्वरूप के प्रति जिज्ञासा भाव एवं इसकी आत्यांतिक खोज के साथ होता है।

आध्यात्मिक अनावरण का विज्ञान

इस मानवीय प्रकृति की खोज तो आधुनिक मनोविज्ञान भी करता है, जो क्रमशः व्यवहार के अध्ययन से प्रारंभ करता हुआ मन की अचेतन गहराइयों के विश्लेषण तक पहुँचता है। जहाँ से आगे फिर मानवीय मन के मानवीय एवं सकारात्मक पहलुओं को प्रकाशित करता हुआ मानव प्रकृति की आध्यात्मिक संभावनाओं की ओर बढ़ता है।

मानवीय प्रकृति के दिव्यस्वरूप के प्रति अपने भौतिकवादी संशय के कारण इसके कदम ठिठक जाते हैं; जबकि अध्यात्म क्षेत्र का प्रारंभ ही इस धारणा के साथ होता है कि मानवीय प्रकृति मूलत: दैवी है। इस अध्यात्म को परमपूज्य गुरुदेव ने उच्चस्तरीय मनोविज्ञान की संज्ञा दी। इस तरह अध्यात्म-जीवन के परम सत्य को व्यक्तित्व के केंद्र में रखते हुए स्व के अनावरण पथ पर आगे बढ़ता है। यहाँ प्रश्न मात्र मन की परतों को जानने भर का नहीं रहता, बल्कि अपने मूलस्वरूप की ओर बढ़ते हुए मन के अँधेरे कोनों का रूपांतरण भी इसका उद्देश्य होता है। अत: अध्यात्म यहाँ मात्र जिज्ञासा, खोज या चर्चा भर का विषय नहीं रहता, बल्कि जीने की पद्धति, होने का विज्ञान तथा अपने मूलस्वरूप में प्रतिष्ठित होने की प्रक्रिया बन जाता है।

चेष्टा पहला सौभाग्य

धन्य हैं वो मुमुक्षु जीवात्माएँ, जो अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति के भव्यतम, दिव्यतम स्वरूप को जानने व मूर्तरूप देने की प्रक्रिया में सचेष्ट हैं, गतिशील हैं। मानव जीवन पाकर यह चेष्टा करना पहला सौभाग्य माना गया

है; क्योंकि इसके बाद ही क्रमिक रूप में जीवन संपूर्ण समाधान की महायात्रा पर आगे बढ़ता है। हालाँकि इसकी प्रारंभिक यात्रा वर्तमान के अंधकार, तमस् नश्वर एवं परिवर्तनशील सत्य (असत्) से होकर आगे बढ़ती है, जहाँ कि व्यक्ति खड़ा होता है; लेकिन यह क्रमशः परम सत्य, प्रकाश, शाश्वत जीवन की ओर बढ़ती है, जहाँ जीवन के सकल दुःख, दुविधाओं व द्वंद्वों का अंततः विलोप होता है।

इसलिए अध्यात्म पथ के राही के लिए जीवन की भौतिक सफलताओं, विभूतियों, धन, ऐश्वर्य, पद, प्रतिष्ठा आदि का अधिक माने नहीं रहता । ये इस यात्रा के सामयिक पडाव भर हो सकते हैं, अंतिम ध्येय नहीं। इसी तरह जीवन के दु:ख, कष्ट, अपमान, पीड़ा आदि आत्मोत्कर्ष की सीढ़ियाँ बन जाते हैं। इस प्रक्रिया में एक अभीप्सु के लिए आध्यात्मिक महापुरुषों का सान्निध्य जीवन की दूसरी बड़ी घटना होती समझने का अभ्यास करता है, जिसके प्रकाश में फिर उसे अपने आध्यात्मिक स्वरूप का क्रमिक रूप में उद्घाटन होता है।

रेशम का कीड़ा

“रेशम का कीड़ा अपने लिए जाला बुनता है और उसी में कैद हो जाता है मकड़ी अपना जाला बुनती है और उसी में जकड़कर बैठ जाती है। मनुष्य भी अपनी अहंता का विस्तार करता है और उससे अवरुद्ध होकर भव-बंधनों की जकड़न से त्राहि-त्राहि करता है। माया की गाँठ मनुष्य ही बाँधता है और खोल भी लेता है।”

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